गुरुकुल ५

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Wednesday, 11 September 2013

रिश्ता / मेरी माँ

मेरी माँ

क्यूं नहीं सोचता
ये अनोखा रिश्ता?

मेरी माँ
बहन
बेटी
दादी
नानी
माँसी
बुआ
काकी
सहेली
और रिश्तों से जुड़े रिश्ते
जो हमारे अपने हैं?

हर युग में
रिश्तों का दर्द?
क्यूं?

पञ्च कन्यायें
मान्यताओं में ही?

क्यूं अविश्वास से भर गया
ये प्यार का रिश्ता?

मेरे पिता
भाई
बेटा
दादा
नाना
मौसा
फूफा
काका
मित्र
और तब लोग पुकारते थे
गाँव की बेटी अकलतरहीन ]
जो हमारे अपने थे

न जाने कैसे?
सिमट गये रिश्ते

आज सब अजनबी से क्यूं लगते हैं?
या सरोकार रह गया शरीर के माँ स से?

चित्र गूगल से साभार
समर्पित विश्व की माँ बहनों को
भादों मास कृष्ण पक्ष द्वादशी
२ सितम्बर २०१३

Thursday, 5 September 2013

विक्रम और वेताल 14



विनम्र आग्रह २ पोस्ट पर आये टिप्पणी कर्ता और सुधि जनों की कृपा से
परिवार में आई खुशहाली के लिये मेरा प्रणाम स्वीकारें आपका योगदान
यूँ ही समय पर मिलता रहेगा
आभार सहित आपका रमाकांत

वेताल ने कहा
राजन
आज आपके चेहरे पर गंभीरता की जगह हंसी
कहीं ऐसा तो नहीं
शहर के लोगों की तरह
मैं भी दृष्टि भ्रम का शिकार हो गया हूँ?
चलो आपके थकान हरने के लिये
एक सत्य कथा सुनाता हूँ
एक महानगर में
रमेश ने अपने मित्र आशा राम से पूछा
क्या हालचाल हैं मित्रवर?

आशा राम ने कहा
सब ठीक ठाक है

पत्नी आज कल जिम जाती है
जोड़ों में दर्द रहता है न
मैंने मोबाईल और गाड़ी का
माडल बदल दिया है
कार का एवरेज २० कि मी प्रति लीटर है
नौकर हर माह बदल जाते हैं
बेटा को अनुदान देकर
पढ़ने विदेश भेजा है
लड़की ने लव्ह मेरिज कर लिया है
दामाद और बेटी 
अलग अलग शहर में रहते हैं 

कुत्ते के कारण
घर में कोई नहीं आता
माँ विगत चार साल से 
अपने दामाद के घर है 
बाबूजी वेंटीलेटर पर हैं 
कोई चिंता नहीं है 

खाना होटल से ही आ जाता है
कपड़ा धोने की झंझट नहीं
धोबी सुबह शाम लेकर चला जाता है
क्रेडिट कार्ड है ना
ये घर भी किराये का ही है
पुस्तैनी मकान बेच दिया 
घर के मेंटेनेंस का भी पैसा बच जाता है 

रमेश ने कहा आशा राम जी मानना  पड़ेगा
आपकी व्यवस्था और सहनशीलता की पराकाष्ठा को

चलो आज मेरे घर भोजन करें 

नहीं मित्र डॉ से पूछकर ही बता पाऊंगा 

पिछले माह हार्ट सर्ज़री हुई है न
शुगर बढ़ गया था
सर्ज़री के बाद
नमक, तेल, मिर्च, मसाले पर रोक है न
डॉ ने उबला हुआ ही खाने को कहा है 
और कह रखा है
भले ही दिन में चार बार ही पीना  
लेकिन हेवार्ड सोडा मिलाकर ही पीना
और समुद्री झींगा
स्वास्थ के लिये ठीक रहेगा
कोई टेंशन नहीं है
इन्कम टेक्स का मामला अदालत में है
दो चार साल में  निपट जायेगा

बड़ा भाई स्वर्गवासी है
बहू ने मुक़दमा कर रखा है

मित्र ने पूछा और कुछ

आशा राम ने कहा 
सब ठीक ठाक है 

वेताल ने कहा 
राजन और 
विक्रम ने भी रौ में कह दिया 
सब ठीक ठाक है

बस क्या था 
वेताल भी लटक गया फ़ौरन 
वहीँ आश्रम के वट वृक्ष की डगाल पर 
विक्रम अवाक देखते रह गये
आश्रम की ऊँची दिवार और गेट को
आश्रम की दीवारों को लांघना …?

०५ सितम्बर २०१३
शिक्षक दिवस के अवसर पर 
मेरे बच्चों को समर्पित 
जिनके कारण मुझे जाना जाता है 
चित्र गूगल से साभार  

Tuesday, 20 August 2013

वसीयत WILL

रमाकांत सिंह वल्द स्व श्री जीत सिंह
दिन रविवार रात ३ बजकर ५७ मिनट


वसीयत को मेरे मरने के बाद कौन पूरा करेगा?
कह पाना आज कठिन है जब मैं जिंदा हूँ
मरने के बाद कोई बाध्यता नहीं न ही कोई बंधन
और ज़रूरत भी क्या किसे फुरसत होगी पूरा करे

जब तक उसे क़ानूनी जामा न पहनाया जाये

न पाने की इच्छा, न मिलने का भरोसा, न देने वाला कोई
क्या बचा है, कौन बताएगा? किसके हिस्से में क्या आया?
जो दिखा रहा है उसका दावेदार कौन कौन है? प्रयास व्यर्थ
कौन टपक जाये क़ानूनी हक़दार बनकर कठिन पेंच होंगे?

फिर भी सब कुछ समाप्त हो जाये ऐसा सम्भव बनेगा?

हिन्दू परिवार में क़ानूनी हक़दार कौन इस पर प्रश्न पर प्रश्न?
लाश सड़ जायेगी नैसर्गिक वारिस खोजने के चक्कर में दो मत?

पिता की मृत्यु के बाद माँ को दाने दाने तरसते देखा है मैंने
और माँ की मृत्यु के बाद पिता को किसी कोने में आंसू बहाते
कोई नई बात नहीं दोष किसका? नियति या दुर्भाग्य किसका
किन्तु प्रेम करते माँ बाप भाई बहन भी हमारे ही बीच आज भी

जब मैं मरूं तो मेरे कारण सबकी आँखों में आंसूं हो मैं क्यों चाहूँगा ?

मेरे मरने के बाद कोई विवाद न हो खासकर अर्थहीन अर्थ हेतु

मेरी दिली ख्वाहिश है की मुझे प्रातः उज्जैन में ही जलाया जाये
और मेरी भष्म से महाकाल का अभिषेक कर मुझे मुक्त किया जाये
आस्थियाँ गंगा में बहाकर मदन मोहन महाराज की गद्दी से
मेरे दत्तक पुत्र युवराज सिंह से श्राद्ध करवाया जाये
ताकि वह भी जाने अनजाने क़र्ज़ से मुक्त हो

बिना किसी तामझाम के शांति पूर्वक सादा भोजन करवायें
मुझे ज्ञात है मेरे चाहनेवाले भोजन ऐसा ही करेंगे
और जो मुझे चाहते ही नहीं उन्हें भोजन करवाकर दुखी न करें
भोजन व्यर्थ कर कुछ सिद्ध करना उचित होगा ?

मेरी समस्त चल अचल संपत्ति पर बराबर का केवल मेरी बहनों
रेखा सिंह, सुनीता सिंह , प्रतिमा सिंह  और सरिता सिंह का ही अधिकार है 

न जाने कब दिन ढल जाये  ……. 
कल वक़्त मिले न मिले तब  ……

मेरे असामयिक निधन पर इसे ही मेरी अंतिम वसीयत मानी जाये 
जीवन क्षण भंगुर है न जाने कब सूरज डूब जाये
सो लिख दिया ,पुरे होश हवाश में, गवाह आप सब   
सनद रहे वक़्त पर काम आवे और विवाद से मुक्त हो जीवन 

कुछ लोग मेरे किसी भी प्रकार के मृत्यु कर्म में शामिल न हों 
और उन्हें खबर न करें जिन्हें मैं सबसे ज्यादा घृणा करता हूँ

रमाकांत सिंह वल्द स्व श्री जीत सिंह
दिन रविवार रात ३ बजकर ५७ मिनट
प्रकाशन दिनांक २०। ०८। २०१३
श्रावण शुक्ल १४ दिन मंगलवार



Saturday, 17 August 2013

छलावा


अब अँधेरा होगा?
भोर हुई
और रवि की किरणों संग
तुमने सोच लिया
जगत को जीत लिया
अब अँधेरा होगा ही नहीं?

विस्तृत आसमान है
उड़ चलो खोलकर पंख
वक़्त थम जायेगा मौज में?
तुम्हारी मर्ज़ी से तुम्हारी खातिर?

अक्षय तरुणाई?
समय की धारा में भी
बारिस के बुलबुले हैं?
कि थम जाये सावन में भी?

अहंकार या बचपना?
या फिर छलावा खुद से?
न संशय न आग्रह
ढीठ, उन्मत्त बन

ज़िन्दगी, ज़िन्दगी है?
ज़िन्दगी में कोई शर्त ?

लेकिन

ज़िन्दगी मेरी है?
मेरी शर्तों पर?
जल तरंग की भांति
नित नये स्वरुप ले

न पुनर्जन्म
न सृजन

मेरे वज़ूद के लिये
मंज़ूर
कोई शर्त नहीं
तेरी मर्ज़ी तू जाने

01जुलाई 2013
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 14 August 2013

पुण्यतिथि

स्व श्री जीत सिंह  { बाबूजी }

बाबूजी

निर्वाण दिवस रविवार
समय दोपहर १ बजकर २८ मिनट
१४ अगस्त १९९४

मैं गर्व करता हूँ कि जीवन में बाबूजी ने कभी मुझे मारा या डांटा नहीं
और आत्मग्लानि महसूस करता हूँ कि अंतिम दिनों में ठीक सेवा नहीं कर पाया
मेरे मित्र, हमराज, गुरु, आदर्श और मार्गदर्शक मेरे साथ नहीं बस यादें और यादें
ऐसे पिता को खोना खलता है जीवन दुबारा है ही नहीं आज जतन हजार हो जाये
लेकिन बाबूजी का मिलना …. ?

कुछ यादें आपसे साझा करता हूँ शब्द उनके लिपि मेरी

*
ऐसी पुस्तक कभी मत बनना
जिसे पढ़ना तो सब चाहें
लेकिन
सहेजना कोई नहीं चाहता
और किसी की सहेजने की प्रबल इच्छा हुई
तो सहेजना न जाने

**
जीवन में कभी नींव का पत्थर मत बनना
बनना तो हमेशा उपरी पत्थर बनना
भले ही अनगढ़ रहो
कल कुछ गुंजाईश तो रहेगी

***
प्यार इतना करो
कि सभी वर्जनाएं टूट जायें
और
घृणा भी इतनी सिद्दत से करो
कि प्यार की कोई गुंजाईश न रह जाये

****
जो तुम्हारे पास है नहीं
कभी उसका शोक मत करना
और जो तुम्हारे पास है
उसे खोना नहीं
भले ही वो तुम्हारी गरीबी क्यों न हो

*****
अपना सब पैसा
अपने माँ, बाप, भाई, बहन, और रिश्तेदारों पर
मत खर्च कर देना
वरना
अर्थ का रीतापन और रिश्तों का छलावा
सह नहीं पाओगे

१४ अगस्त २०१३ पुण्यतिथि 

Sunday, 11 August 2013

साया


पांच साल में एक बार आकर, हमारा वोट ले जाकर
1975 / 76 पेंड्रा बिलासपुर जिला मध्यप्रदेश में मुलाकात हुई श्री एच एन श्रीवास्तव जी कवि और गणित लेखक { बी एल कुल्हारा और  एच एन श्रीवास्तव } अद्भुत बाल मन लिये उनके आग्रह पर लिखा व्यंग 
श्री श्रीवास्तव जी अन्डी में प्राचार्य पद की शोभा बढ़ा रहे थे.  

श्री एच एन श्रीवास्तव जी को समर्पित 

हे प्रभु
हमारे अन्नदाता
लोगो को भयदाता
पांच साल में एक बार आकर
हमारा वोट ले जाकर
हमारे भाग्य विधाता
भले ही हम मरे या जियें
किन्तु आपकी जय हो,जय हो

मालिक
आपका साया
हमारे सर पर बना रहे
भले ही पूरा बदन खुला रहे
चाहे लुंगी, बनियान,
क्या अधोवस्त्र?
जड़ से गायब रहे

हुजूर
ये दिखावे के अंगरखा
हिजड़ों का जामा है
राज्यसभा और लोकसभा में
आपके सनेही
परम विदेही
पुत्रों का हंगामा है

मेरे मौला
मेरे आका
डाकुओं से मिला
आतंक वादियों का पिल्ला
लुच्चा, लफंगा पर थोड़ा भोला
केबिनेट मिनिस्टर
उसका ही साम्भा है

हे चक्रधारी
अमीरों के गिरिधारी
बाकी कुछ शेष
भग्नावशेष
प्रतिरक्षा मंत्री
उसका एक मामा है

15 सितम्बर 1975
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 7 August 2013

मैं फ़रिश्ता हूँ?

शब्द आप बनो मेरे गीत हम बन जायेंगे
लफ्ज़ आप बनो हम सरगम बन जायेंगे

**
मंजिल आप चुनो राह पर बिछ जायेंगे
खुश रहें आप यूँ ही खुशियाँ बटोर लायेंगे

***
यूँ ही प्यार करते रहें प्यार हम निभायेंगे
कोशिश करें आप जरुरत हम बन जायेंगे

****
दर्द दिल में हो तो हर लम्हा उदास होता है
अजीब शै है ये मोहब्बत ये कहर ढाता है

*****
बने मंजिल यूं तो पाने को तरस जायेंगे
राह पर बिछो धूल बन लोग रौंद जायेंगे

******
मैं फ़रिश्ता हूँ? ये कब कहा तुमसे बोलो न?
मैं भी इंसां हूँ कभी भूले से समझा तुमने ?

*******
तेरा दिया बिन कहे तेरे को ही लौटा दिया
तेरी मर्ज़ी इसे फूंके या करे दफ़न यादों में

07 अगस्त 2013
चित्र गूगल से साभार
मेरे गीत ब्लॉग के सर्जक भाई सतीश सक्सेना जी
को उनकी रचना धर्मिता के लिए समर्पित 

Monday, 15 July 2013

परी / FAIRY QUEEN



उतरकर  स्वर्ग से नीचे
जमीं पर पांव धर लो?
सहचरी हो मेरी
मैं जानता हूं तुम्हे

न पूजो मानकर ईश्वर
न बन साधिका तुम विचरो
सृजन संकल्प ले जग का
श्रृष्टि संताप हरने को

भटकती प्रेम की खातिर
धरकर रूप माया का
बन घन आसमां में
नित निज प्रेम पथ पर

जब कभी आसमां से
मिलन के रंग डूबी
वसुधा पर उतरती
विव्हल उन्मुक्त गति ले

बिन बूझे अमंगल को
श्रृष्टि को भाव मंगल से
प्रेम से सिक्त कर जाना
नियति है तुम्हारी

जन्म से तुम मधुर हो
जानता है जगत तुमको

उफनती गिरि धरा से
नदी बन हो तरंगित
सदा मिलने समंदर से
प्रतीक्षा में प्रिय के

संज्ञा शून्य, महा ठगिनी
उद्विग्न और चंचल
कहां फिर जान पाती हो
दिव्य अपनी नियति को ?

गगन से शून्य तक भटकाव
और अस्तित्व के ठहराव में

अम्बर से उतरकर
तुम्हारी मधुरता
विलीन हो जाती है
समुद्र से मिलकर

प्रलय और सृजन का
तुम्हारा चंचल सौन्दर्य
और सम्मोहक भाव देख
थम जाता है काल भी

भर जाता है न खारापन?

प्रलय मैं सह नहीं सह सकता
सृजन तुम कर नहीं सकती

परी सी स्वर्ग से नीचे
जमीं पर पांव मत धरो
विचरो आसमां में तुम
सदा ही आसमां के पास

मैं खुश हूँ
आज भी हर पल
धरा से देखकर तुमको
मेरा सिर गर्व से तना


०६ जुलाई २०१३

Wednesday, 10 July 2013

विक्रम और वेताल 13

आज भी कायनात का वजूद अच्छे लोगों से ही है?


एक लम्बे अंतराल बाद
वेताल की सवारी विक्रम के कंधे पर
जुगनुओं की रोशनी में बियावान रास्ता
वेताल ने कहा
राजन
ज़रा गौर करें

ये आपका विस्तृत साम्राज्य
समृद्धि और खुशहाली
लेकिन
शिकायत प्रति पल क्यूं?
जीवन के प्रत्येक पग पर?

*****
हम मिलते हैं एक दिन में सौ नये लोगों से
इनमे से 97लोग सही और 3 लोग गलत
साबका पड़ता है इन्ही तीन गलत लोगों से
97 सही लोग छुट जाते हैं निभाने के लिये

पुनः अगला दिन वही क्रम फिर मिले सौ लोग
आज भी निर्वहन नये तीन गलत लोगों से ही
छुट गये दुर्भाग्य से शेष 97 सही लोग क्रम से
यही क्रम चल गया मृत्यु तक जाने अनजाने

हमने मान लिया दुनिया बुरे लोगों की ही है?

*****
कभी ऐसा भी होता है मिले हम सौ लोगों से
इनमे से 97 लोग गलत और 3 लोग ही सही
कुछ ऐसा चक्र चला ये तीन सही ही रहे हमारे संग
छुट गये पुरे 97 बुरे लोग आज बिन कहे सौभाग्य से

सोमवार को जो क्रम था वही बना रहा रोज
बस ये वार बदलते बदलते महीने बन गये
महीने बदल गये बरस में पलक झपकते
और न जाने कब बीत गया जीवन देखते देखते

लगा ये दुनियां केवल सज्जनों से भरी है

राजन
आपकी भृकुटी क्यों तन जाती है
मत भुलिये ये संसार सार है

जीवन और लोगों की भेंट का एक ही निश्चित क्रम है?
बदल जाते हैं रास्ते और गिनती का फेर कभी कभी बूझे अनबूझे?
किसी के हिस्से कम तो किसी के हिस्से जियादा पड़ जाते हैं
बस सही गलत का मायने और अंदाज़ जुदा हो जाता है?

कुछ भी अछूता नहीं रह गया है आज इस संक्रामक रोग से
लिंग, वर्ण, जाति, संप्रदाय, रंग, देश, विदेश, हम, आप,साहित्य
शिक्षा, धर्म, गंवार, विद्वान, नेता, अभिनेता, जननी, जनक, और रिश्ते
पिस गये हैं इसी चक्की में चाहे अनचाहे रोज पल पल समाज

राजन
आप विद्वान और न्याय प्रिय हैं
फिर विस्मय किस बात पर

आज भी कायनात का वजूद अच्छे लोगों से ही है?

भले ही हमारी मुलाकात न हो उनसे और जीवन बीत जाये
भटकते भटकते अंधेरे में उजाला खोजते खोजते चोट खाते
चंद लोग बुरे हों या भले मिले हम उनसे धारणा बन जाती है।
मन खिन्न है सवाल का जवाब हर हाल में चाहिये सवाली है खड़ा

*****
कभी कभी सब अच्छे लोगों से ही नित हमारी मुलाकात होती है
किन्तु जैसे ही हम अपना प्रयोजन स्पष्ट करते हैं अचानक?

विक्रम ने सोचा
और वेताल ने ताड़ लिया

लोग बुरे ही हैं तो ये दुनियां कैसे चल रही है ये डूबती क्यों नहीं?
यदि लोग भले हैं तो शोर शराबा थमता क्यों नहीं अँधेरा क्यूँ है?

06 जुलाई 2013
समर्पित मेरी ज़िन्दगी को
और सवाल संग शिकायत भी

Saturday, 6 July 2013

तेरे बिन


मैं चला था अकेला,  आज  फिर तन्हा तेरे बिन,  कल  भी तन्हा तेरे बिन

*
आज है?
कोई बंदिश
कोई तटबंध
निमंत्रण वा आमंत्रण
स्पर्श न आलिंगन
तो फिर
ये उदासी क्यूँ?

 **
कल थीं
बंदिशें हर पल
बंधी सीमाओं में
मौन
कहना
सुनना
स्पर्श और आलिंगन
फिर भी आनंद ही आनंद
क्यूँ ?

***
कल
न होंगी बंदिशें
न तटबंध न  सीमायें
दे निमंत्रण कर आमंत्रण
रचो इतिहास कर आलिंगन
धरो पग व्योम पर निर्भय
सिकन क्यूं?
फिर माथे पर
****
कल
मैं चला था अकेला?
आज क्यूं?
फिर तन्हा तेरे बिन
कल भी जीना?
तेरे बिन

06 जुलाई 2013
ज़िन्दगी के संग चार कदम चलते चलते
चित्र गूगल से साभार

Monday, 1 July 2013

धान के कटोरा / छत्तीसगढ़ CG



छत्तीसगढ़ ल कहिथें भईया धान के कटोरा
ये गीत मेरे अंतर्मन को छू जाती है,
गाँव में दुर्भिक्ष के कारण मन में विचार आये
१४ सितम्बर १९७५ को अंकन कर दिया

एक कविता **धान के कटोरा**

तब मन के भाव का कारण था अल्प वृष्टि और नहर के जाल का न होना
आज नहर और तकनीक साथ ही कृषि के विकसित आयाम,
शासन की योजनायें हैं किन्तु प्रगति के सोपान ने खासकर
उद्योग धंधों में प्रयुक्त बिजली की खपत में  एक बार फिर
वही मंज़र नज़र आता है बस कुछ चेहरे और हालात जुदा हैं

आखिर समंदर में या धरातल पर अतिरिक्त पानी आयेगा कहाँ से?
चलो आ गया तो बिजली में प्रयुक्त पानी का पुनर्निर्माण संभव?
बदलेगा कास्मिक साईकल या धरातल से फूटेगा फव्वारा जल का?
उपयोगी पानी की मात्रा जानकर भी हम कर रहे है खिलवाड़ जीवन से?

आज शिक्षा की यात्रा में जैसे बच्चों के चेहरे से बचपन छिन गया है
कहीं ऐसा न हो कल छत्तीसगढ़ के धान का वैभव इतिहास बन जाये
और पावर हब बनने बनाने के चक्कर में किसानों की हाथ में
खाली कटोरा ही बचे भीख माँगने को बाकी तो समय बताएगा

कल अल्प वृष्टि ने, और कल भविष्य का पावर हब रंग दिखायेगा ही
इस कल्पना में डरा मुलमुला छ. ग.गाँव का किसान मुंह बायें खड़ा

**धान के कटोरा**

छत्तीसगढ़ ह रहिगे भईया गर्रा अऊ बड़ोंरा ददा गर्रा अऊ बड़ोंरा
छत्तीसगढ़ ल काबर कहिथें धान के कटोरा भईया धान के कटोरा?

बोट लेहे के बेरा म राजा हमला ददा कहिथें
काम निकल गे त हमन ल भखला कहिथें
हमरे बनाये मंत्री ददा हमन ल गरियाथे
चल घुंच, फेर आ कहिके रोज २ तिरियाथे

बड़े बड़े सुपेती उंकर सोफा सेट ह पिराथे
हमन ल गोदरी बर डोकरा लट्ठा ल देवाथे
का लेबे रे तैं हर मंगलू डौकी तोर खिसियाथे
लोग लइका बर चाउर ले ले पसिया ल पियाबे

बड़े बड़े मोटर म बइठ के राहत कार बनाथें
हंकर हंकर बुता करे बर नोनी खंती ल बताथें
अउठ रुपिया भूति मिलथे तेल नून नई पुरय
भात रोटी के बात करथें बासी घला नई बांचय

खीर पुड़ी इकरेच बाहटा पानी कस दूध फेंकाथे
मोर लइका दिन भर मुर्रा लाड़ू लाई बर तरसगे
बुकुर बुकुर तोर मुंह ल देखव संझा ले बिहनिया
दू जुवार मोहु ल दाई ददा बर खीचरी ल पुरोदे

भुइया खिरगे, जांगर खिरगे, खिरगे भुइयां के पानी?
सूरज खिरगे, बादर खिरगे, खिरगे मनसे के पानी?

माटी के भगवान बने आज ए माटी बनगे मनखे?
धरम पीरा  छिन भर म दाउ कइसे तोर भुलागे?

१४ सितम्बर १९७५

Tuesday, 25 June 2013

जियो तो जानूं



वेताल ने कहा
राजन

ऐसा नहीं लगता आपको
इस हादसे ने
आस्था और विश्वास पर
खड़े कर दिये अनगिन प्रश्न

मौन तुम्हारा भी बोलता है
विश्व बंधुत्व के खोखले राज खोलता है
तोर पेट म बहुत बाबू लइका मोर का काम के

की भाषा खुलकर बोलता है

जन नेता, सरकार, देश,
न्यूज़ चैनल, सिद्ध योगी
हिन्दू, मुसलमां, सिक्ख, ईसाई
न ही विश्व
बंधे एक सूत्र में?

सीमाओं में बंधे
राजनैतिक दल, और राजनेता?
सीमाओं को कहाँ तोड़ पाया कोई देश?
बाट जोहता किसी याचना के

वेताल ने कहा
राजन

चाहता यदि विश्व
तो बंध जाते सौ सेतु
बंट गये आज फिर हम?
किस सीमा में,

अपनी कुंठित सीमा में?
अपनों के ही लिये?

मैं फ़रिश्ता कहां
कब कहा मैंने
मैं मुर्दा हूँ
तुम बखूबी जानते हो

मैंने देखा है
तबाही का मंज़र
तुम इन्सा हो
तुम तुम्हारी जानों

बढाकर हाथ किसी मज़लूम की खातिर
तोड़ सब सीमायें तुम जियो तो जानूं

चित्र गूगल से साभार
25.06.2013
***केदारनाथ में फंसे लोगों को विश्व चाहता तो
एक ही दिन में बचा सकता था
किन्तु ऐसा हो न सका क्यों?

***तोर पेट म बहुत बाबू लइका मोर का काम के ***
तुम लड़का जन सकती हो लेकिन मेरे किस काम का
आपके पास सब कुछ मेरे किस काम का

Thursday, 20 June 2013

निर्विकार / मौन / निश्छल


सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। 
        सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

केदारनाथ की पावन यात्रा में शामिल लोग अनायास बादल फटने से भूस्खलन से काल
कलवित हो गये। देश विदेश से आये दर्शनार्थी फंस गये इस प्राकृतिक आपदा में टी.वी.
पर समाचार की निरंतरता ने जहां लोगों को अपनों से जोड़ा तो दूसरी ओर भयावह
घटना को दिखलाकर दिल दिमाग और जनमानस को दहला भी गया।
लोग जुटे हैं सेवा में हम भी चिंतित हैं परिजनों के हाल जानने

जो लोग नहीं हैं हमारे बीच उनकी सुध मालिक जाने मैं तो बस प्रार्थना करता हूँ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

बाबूजी ने बचपन  में एक कहानी सुनाई थी मन हल्का करने के लिये आपसे साझा करता हूँ

बहुत बरस पहले ऐसे ही एक आपदा में बहुत सारे लोग मारे गये
उस आपदा में गाँव की गरीब नर्मदा का बेटा भी फंसा था
दबी छुपी जबान से खबर नर्मदा तक पहुंची बेटा मृत्यु को प्राप्त हो गया
जवान बेटे की लाश लावारिस सड़क के अमुक जगह औंधी पड़ी है

नर्मदा बदहवास दौड़ पड़ी नंगे पाँव बेटे की लाश देखने भूखी प्यासी
चौराहे पर जमा लोग पचास लोग सौ बातें तरह तरह की सुनी अनसुनी
एक आवाज़ आई कहाँ है मेरा बेटा अरे कोई पानी पिलाओ उसे
भाई ज़रा उसका चेहरा ऊपर करो आखरी बखत में चेहरा देख लूँ

लोग छिटकने लगे कोई सेवा न करनी पड़ जाये
मौज की जगह आफत न पड़ जाये गले अकारण

माँ के अनुनय विनय पर किसी ने औंधी पड़ी लाश को सीधा किया
माँ के चेहरे पर परम संतोष के भाव जागृत हो उठे चित्त शांत हो गया
जो माँ बदहवास नंगे पाँव, भूखी प्यासी, रोती  बिलखती आई थी
उसी भीड़ का हिस्सा बन गई निर्विकार, मौन, निश्छल

वेताल ने कहा
राजन

ये घट जाता है रोज किसी चौराहे पर
आज दर्शन या पूजा के बहाने
तो कल किसी आवेश में
हम भी बन जायें
उसी भीड़ का हिस्सा?

२० जून २०१३
मेरी श्रद्धांजली उन लोगों को
जो केदारनाथ जी दर्शन करने गये थे

Sunday, 9 June 2013

नक्सली / वनवासी

मैं नक्सली हूँ?  या मैं ही वनवासी?  यदि नक्सली ही बन गया तो?
मैं नक्सली हूँ?
या मैं ही वनवासी?

बहुत मुश्किल है
वनवासी  के झुरमुट में
नक्सली ढूढ़ना

सबने पहन रखे हैं
एक ही मुखौटे?

वनवासी के बीच

नक्सली

वनवासी  ही
खोजना जानता है

और हर बार
खोज लेता है
गड़रिया बन वनवासी

या फिर खोज निकालता है
घात लगाकर
भेड़िया बन नक्सली
या रक्षक बन
मेरे अपने
जो हैं मेरे अपने?

जन्म से मैं वनवासी
नक्सली हूँ नहीं

आज भी वनवासी रहकर ही
नक्सलियों में
न ही बन पाया वनवासी

और दोहरी प्रताड़ना झेलकर भी
नक्सली ही कहाँ बन पाया

नहीं रहा मैं वनवासी ?

यदि
नक्सली ही बन गया तो?

26 मई 2013
समर्पित
दरभा घाटी नक्सली हमले में
घायल और स्वर्गीय लोगों को
और चिंता में वनवासियों के

Wednesday, 15 May 2013

भरोसा

I LOVE YOU SO MUCH 


*
एस. एम. एस. किया
आई लव यू सो मच
फिर रिंग किया
बड़ी बेचैनी से

प्रिये
तुम्हे एस. एम. एस. मिला?

ये पूछना प्रेमिका से ही
भरोसा उठ गया?

**
संविधान के नियमानुसार
चुना जिसे हमदर्द मानकर
सुख दुःख को बांटने
प्रजा तंत्र की राह पर

फिर ये कहना

सरकार चलेगी?
क्या खुद पर से उठ गया विश्वास?

***
चौराहे पर लगाकर सिगनल
लाल, पीला और हरा
कर दी सिपाही की नियुक्ति
मुसाफिर
रुकेगा या पार हो जायेगा?

तंत्र या नियम पर
रह गया विश्वास?

****
तुम्हे यकीं है
परमात्मा पर?

लेकिन

तुम जानती हो
मुझे तुम पर खुद से ज्यादा

कल उगेगा सूरज पूरब से ही
और डूब जायेगा पश्चिम में

भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा
न इम्तहान ले नेकी बदी की कभी

ये जमीं आसमां मिलेंगे क्षितिज पर ही
कभी फलक पे कभी लहरों में समंदर के

१० अप्रेल २०१३
ज़िन्दगी के संग चलते चलते

चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 1 May 2013

झूठ /आदर्श



झूठ आदर्श का पूरक है?
और आदर्श झूठ का संपूरक है?
झूठ ही आदर्श को स्थापित कर देता है?
आदर्श झूठ की जननी है?

जो सच है वह आदर्श है?
जो आदर्श है उसका कहीं भी अस्तित्व है?
जो है नहीं वही आदर्श
मृगमरीचिका की भांति?

बियावान ज़िन्दगी
सरपट
किन्तु कंटीली राहें
बेमौसम बरसात
झुलसता दिन
सर्द रात
खाली पेट
खुले हाथ

झूठ पर टिका सच

चंदामामा आयेगा
मालपुआ पकायेगा

हम सब खायेंगे?
हर रोज?

बिना नागा?

२५.०८.2०००
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 24 April 2013

अगला जन्म

मेरी ज़िन्दगी तेरे बिन ज़िन्दगी?


आसमान से एक परी उतरी
मैंने परी से कहा

तुम मेरी ज़िन्दगी हो


मैं तुम्हे बेइन्तहा प्यार करता हूँ
परी ने कहा मुझे मालूम है

परी ने अचानक एक दिन कहा

मुझे लगता है
अब मेरे जाने का वक़्त आ गया

कहाँ?

जहाँ से मैं आई थी

मैंने कहा
एक वादा करो

तुम्हारा अगला जन्म मेरे लिये
उसने कहा क्यों नहीं?

वादा रहा

अगला जन्म आपके लिये ही

इस स्वार्थी दुनिया में
इतना टूटकर आज चाहता कौन है?

१० अप्रेल २०१३
समर्पित मेरी ज़िन्दगी को

चित्र गूगल से साभार



Friday, 19 April 2013

सादगी



*
सादगी अच्छी है
विचार ऊँचे हैं
स्वागत करते हैं
बशर्ते
इस पर कोई हँसे नहीं
वरना ये सादगी बदल जाती है
छिछोरेपन में
तुम मानो न मानो
लोग ऐसा ही कहते हैं

**
बंद कर मुट्ठी
चले आये यहां
बंद कर मुट्ठी
कल चले जाओगे
खोलकर मुट्ठी
गर बैठे उम्र भर
सोचो
तन्हा बैठोगे?
तन्हा चले जाओगे?

***
कैसा मातम
कैसी तन्हाई
तेरे जाने पर
कैसी ख़ुशी
ऐसा आलम
तेरे आने पर
ये मैं जानूं
या तू जाने

****
तुझसे मिलना भी
कसकता है
बिछड़ना होगा
फिर भी
इंतजार रहता है
मैं तेरा इंतजार करता हूँ
मैं तेरा इंतजार करता हूँ

चित्र गूगल से साभार
तथागत ब्लॉग के सर्जक
श्री राजेश कुमार सिंह को समर्पित

Monday, 15 April 2013

गुरुकुल / गुरु ३

यदि योग्य गुरु को अवसर दिया जाये विद्यालय सञ्चालन की जहाँ उसकी इच्छा के शिक्षक हों
तब उपलब्ध सुविधाओं में ही प्रत्येक छात्र छात्रा को तराशकर मेधावी बनाया जा सकता है
स्मरण होता है बचपन और गुरु का अगाध प्रेम आदरणीय दीनानाथ जी अकलतरा हाई स्कुल के प्रथम प्राचार्य, श्री उदय प्रताप सिंह चंदेल, श्री लक्ष्मीकांत ज्योतिषी जी,और श्री कौशल सिंह, श्री छत्रधारी सिंह, श्री मेदू लाल जी, जिनकी वाणी की प्रखरता और पांडित्य ने जिन शिष्यों की गरदन नापी वो आज अपने क्षेत्र और परिवार में इनके शिष्य कहलाने में गर्व अनुभव करते हैं।

गुरु के पास संग्रहित श्रेष्ठ ज्ञान सुपात्र शिष्य को दिया जाता है और उस विद्या में पारंगत करने की प्रक्रिया गुरु दीक्षा तथा पारंगत होने के बाद गुरु को यथेष्ट दान गुरु दक्षिणा कहलाती है? सिद्धि की प्राप्ति के लिये गुरु दीक्षा को सदैव अनिवार्य कर्म माना गया है? गुरु दीक्षा सदा सद्गुरु अर्थात उत्तम गुरु से लेनी चाहिये अन्यथा अयोग्य गुरु शिष्य में अपने समस्त अवगुण आरोपित कर कुपात्र शिष्य में परिवर्तित कर देते हैं?

गुरु व्यक्त और अव्यक्त रूप से समग्र विश्व में व्याप्त हैं जो असहज को सहज बना देते हैं।

अर्जुन, कर्ण, एकलव्य, आरुणी जैसे शिष्यों ने गुरु मन्त्रों का स्मरण कर अन्तर्दृष्टि से अंतर्मन को जागृत कर स्पर्श द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को जागृत कर अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त किया।

विद्यार्थी आज विश्व में खनिज की भांति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं किन्तु अनन्य भक्त सूरदास की भांति परम शिष्य अर्जुन या कर्ण द्वापर युग को जीवंत कर जाते हैं।

सद्गुरु सदा ज्ञान रक्षा, दुःख क्षय, सुख आविर्भाव, संमृद्धि और सर्व संवर्धन का आशीर्वाद देते हैं। सद्गुरु से ही कष्ट क्षीण होता है और मन प्रफुल्लित रहता है योग्यतायें स्वतः विकसित होती चली जाती हैं।

जिससे उचित मार्गदर्शन, अन्तर्दृष्टि, प्रवीणता, काव्य प्रेम, आत्मज्ञान, वेद पुराण, आध्यात्मज्ञान, ज्योतिष ज्ञान, ज्ञान विज्ञान, और अध्ययन अध्यापन के प्रति जिज्ञासा जागृत हो और धर्म का भाव प्राप्त हो वही जनक की श्रेणी में आता है?

अध्यापन काल में रेखागणित का प्रश्न ....
समकोण त्रिभुज को नामांकित चित्र सहित समझाओ?

जिसमे भुजा अब की माप ४ से मी, भुजा बस ५ से मी और भुजा सद ५ से मी हो
*सर्वप्रथम रचना लिखवाई गई
सभी भुजाओं के माप, फिर रफ में बनवाया गया चित्र, आधार सहित सभी भुजाओं के माप का अंकन लिखा गया, कोंणों के माप को अंकित किया गया, भुजा को रेखाखण्ड की भांति दर्शाया, समकोण को अंकित किया गया, कोणों के माप का योग १८०अंश दर्शाया गया, अंत में लिखवाया इस प्रकार समकोण त्रिभुज अ ब स प्राप्त हुआ।
गुरु जी ने कहा अब तुम्हे कम से कम १० में ८ अंक मिल सकते हैं।

*कक्षा पहिली में कमल का क लिखना सिखलाया गया

एक छोटी सी आड़ी लकीर खीचो जी
उस आडी लकीर के बीच से उतनी ही बड़ी नीचे की ओर खड़ी लकीर खीचो जी
अब खड़ी लकीर के बीच में बायीं तरफ एक गोला बना डालो जी
अब खड़ी लकीर के बीच में दाहिनी तरफ भी एक गोला बना डालो जी लेकिन नीचे मत मिलाना ऐसे
प्रत्येक गतिविधी को गुरु स्वयं करके बतलाये और इस बीच हमारे मध्य घुमकर हाथ पड़कर दिशा निर्देश भी देते रहे समझाया भी, धमकाया अलग, और ठोंक ठठाकर दुरुस्त भी किया।

***तब गुरु शुभ ग्रहों से युक्त धार्मिक, सूर्य सा प्रचण्ड, नीति निपुण, निष्ठावान, शोधी, तीक्ष्ण ज्ञानदाता थे तब शिष्य विलक्षण हुए।

***आज माँ / बाप / पालक को फुर्सत नहीं और कम समय में अभीष्ट लक्ष्य की चाह
दबाओ कम्प्युटर का की बोर्ड और लिख डालो कमल नहीं कल्लू का क******

06जुलाई 2010
मो सम कौन कुटिल खल ......? ब्लॉग के सर्जक
श्री संजय अनेजा जी को समर्पित

चित्र गूगल से साभार

Saturday, 13 April 2013

विक्रम वेताल १२

** जाने क्या ढूढ़ती रहती हैं ये आँखें मुझमे राख के इस ढेर में शोला है न चिंगारी है **


गतांक से आगे

अब तक आपने पढ़ा ...वेताल को गुड़ाखू की तलब फिर जागृत हो गई और वह कुएं की जगत पर गुड़ाखू घिसने बैठ गया........................

अब आगे

विक्रमार्क लघुशंका निवृति के बहाने थोड़ी दूर जाकर भूतकाल में जाने का सद्य: प्राप्त मन्त्र पढ़ने लगा।
तत्क्षण सब कुछ आँखों के सामने चलचित्र सा स्पष्ट हो गया। प्रसन्नता पूर्वक वह वेताल के पास जा  पहुंचा और उसे कंधे पर लाद रेलवे के अनमैन्ड खोंड फाटक की ऒर चलना आरम्भ किया

राजन ने कहा हे वेताल
अब जो मैं कहता हूँ ध्यान पूर्वक सुनो
इस जीव की पिछली पीढ़ी भारतीय रेल की सेवा करते देश के विभिन्न भू-भागों से गुजरी, वहां के निवासियों के गहन संपर्क में आई और इस जातक के जन्म में यथा शक्ति सभी भू -भागों के निवासियों ने अपना योगदान दिया। उसी के परिणामस्वरूप भारत की अनेकता में एकता जैसे शारीरिक लक्षणों से युक्त इस जीव का जन्म हुआ। कालान्तर में व्यक्तित्व विकास के अलग-अलग चरणों से गुजरते हुए रोजी रोजगार चलाने की प्रक्रिया में अचानक उसने पाया कि अंततः वह रचनाकार उर्फ़ पत्रकार जैसा कुछ बन गया।

तत्पश्चात यह जीव अलग-अलग पाला, खूंटा, मालिक, विचार ,निष्ठा बदलते हुए एक दिन सड़क पर छोटी सी भीड़ के पीछे जा लगा और संस्कृत कथा में पांडित्य प्राप्त अभिमानी चार ब्राह्मण युवकों सदृश्य " महाजनो येन गत: स पन्थाः" का अनुसरण करते हुए अपने को जीवन के अंतिम पड़ाव, श्मशान के वीराने में भ्रमित, चकित और अनाथ सा महसूस करते हुए खड़ा पाया। कुछ समय चहुँऒर देखने पर उसकी नज़र श्मशान में दूर खड़े कालिया नामक गर्दभ पर पड़ी, जिसे देखकर उसे उपरोक्त वर्णित ब्राह्मण युवकों की तरह एक दुसरे श्लोक-- निर्जन और वीराने में मिलने वाला जीव अपने बंधू के समान होता है का स्मरण हो आया, तत्काल ही उसके ह्रदय में किसी दैवीय प्रेरणा से बंधुत्व भाव जागृत हो गया। इस चौपाये के समीप पहुँच अपना परिचय देकर भातृभाव से पूछा-- हे रजक सहायक बन्धु श्रेष्ठ कृपाकर अपना परिचय सहित मार्गदर्शन दें।
हे वेताल,वैशाखनंदन ने अपना सक्षिप्त परिचय देते हुए जो कहा वह कथा इस प्रकार है---

यह कालिया गर्दभ अपने पुराने काम और मालिक को छोड़कर पलायित हो  " द ग्रेट  इन्डियन गंगा जमुना सर्कस" के विशाल पंडाल के समीप पहुँच अपना राग छेड़ने लगा। सर्कस मालिक के युवा बेटे को उसका यह राग नए किस्म के रिमिक्स की तरह जान पड़ा और उसने इस सड़कछाप जीव को अपने सर्कस में पनाह दे दी। सर्कस जब एक शहर से दुसरे शहर जाता तब कालिया बोझ ढ़ोता और सर्कस में दो करतबों के बीच फिलर के रूप में आकर दर्शकों को * गर्दभ रिमिक्स * सुनाकर उनका मनोरंजन करता। समय के साथ सर्कस के पुराने मालिक का इंतकाल हो गया और सर्कस को जगह -जगह ले जाने में बढ़ते खर्च के मद्देनजर मालिक के युवा पोते ने सर्कस को चिड़ियाघर में तब्दील कर स्थाई रूप से देश की राजधानी दिल्ली में स्थापित कर दिया।

गुजरते समय के साथ कालिया को चिड़ियाघर का मैनेजर बना दिया गया किन्तु कालिए को वहां की तमाम सुविधाओं के बीच अपने शहर की याद सताती तो वह कुछ दिनों की छुट्टी लेकर यमुना और गंगा के तट पर बसे अपने पुराने शहर में बिताता और पुराने मित्रों से मिलता। उन दिनों को याद करते धोबी घाट पर जाता और तात्कालिक समय की यौवन से पूर्ण की गदहियों की चुहलबाजियों की मीठी यादों में खो जाता, विशेष कर रानी नामक गधी की जो प्रचुर यौवन से भरी और सर्वाधिक ज्ञानवान थी जिस पर कालिया जी जान से फ़िदा था पर वह घास नहीं डालती थी किन्तु प्रियदर्शन नामक एक अन्य गर्दभ को अपना दिल दे बैठी थी और उसे "गर्दभ कुल कमल दिवाकर" मानती थी, का स्मरण होता तो वह श्मसान रोदन को विवश हो जाता।

कभी कभी वह हरिश्चद्र घाट की ऒर निकल  जाता और गला खोलकर अपने जन्मजात राग में रेंकने लगता ऐसे ही एक प्रवास पर सोनपुर के इस विचित्र जीव को उसने देखा, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है, इस मानवीय लक्षणों के काकटेल सदृश्य दुर्लभ जीव को पाकर कालिये के ह्रदय में भी वैसा ही बंधुत्व भाव जगा जैसा सोनपुर के इस विचित्र जीव में जागृत हुआ था

इस सोनपुरिया जीव का परिचय जानने उपरांत कालिए के मन में यह विलक्षण विचार कौंधा कि यदि वह इस विचित्र जीव के साथ अपना राग मिलाकर रीमिक्स रिकार्ड करवाये तो यह नूतन प्रयोग निश्चय ही बिकाऊ होगा, भले टिकाऊ न हो।परन्तु यह गान इस जीव का अंतिम गान बना .चिड़ियाघर के मालिक ने इस जीव के साथ अपने पुराने कर्मचारी कालिए को भी बाहर का रास्ता दिखाया। कालिये के साथ उसकी यह जुगलबंदी टिकाऊ साबित सिद्ध नहीं हुई। अलग -अलग मीडिया ठिकानों से यह जीव मालिकों के साथ विश्वासघात के दंड स्वरुप  नेपथ्य पर ** तात लात मोहिं मालिक मारा ** जैसे पाद प्रहार से प्रताड़ित हो हंकाला जाकर सोनपुरा के निकट नव निर्मित प्रदेश छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आकर  मौत की पदचाप सुनते,वनों में चरने वाले पृथ्वी पर भार, हिरणों के स्वरुप अपने निरर्थक, दोगलेपन से भरे उपेक्षित जीवन का दंश झेलते अपना अंतिम समय बिताने लगा

अक्सर जब लोग इवनिंग वाक करते उसके घर के पास से गुजरते तो उन्हें ६0के दशक के पुराने गीत की पंक्तियाँ ** जाने क्या ढूढ़ती रहती हैं ये आँखें मुझमे राख के इस ढेर में शोला है न चिंगारी है **सुनाई पड़तीं
इस विचित्र जीव के जन्म रहस्य का इस प्रकार वर्णन कर राजन ने अपना उत्तर समाप्त किया ।


राजन का उत्तर समाप्त होते -होते वे रेलवे के मानवरहित खोंड फाटक तक आ पहुंचे।
अचानक खट्ट की आवाज़ हुई राजन ने झुक कर देखा तो गुड़ाखू की डिब्बी ज़मीन पर गिरी पड़ी थी।

वेताल ने कहा हे विक्रमार्क


मेरी सीमा यहीं समाप्त होती है। आगे दुसरे वेताल का क्षेत्र है और हम मानवों सदृश्य एक -दुसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करते,गुड़ाखू और मानिकचंद के पाउच के लिए धन्यवाद,
***यू आर रियली जीनियस *** 
कहकर सोनपुरा की रात के अंतिम पहर की निस्तबधता को अट्टहास से तोड़ता हुआ जूठही रेल्वे लेवल क्रासिंग के पास के बूढ़े पीपल की सबसे ऊंची डाल पर जाकर लटक गया

इति कथा।