गुरुकुल ५

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Wednesday, 12 March 2014

पद्म श्री अनुज शर्मा



पारिवारिक क्षणों में श्री राहुल कुमार सिंह के साथ पद्म श्री अनुज शर्मा जी 
ये कह पाना कठिन कि मेहमान कौन और मेजबान कौन
विनम्रता, सहनशीलता, ज्ञान, विवेक, धैर्य, अनुशासन, हमने भी सीखा संगत में
 अकलतरा पैतृक गृह ग्राम में पंडित जी, भाई, बहनों और भतीजों संग राहुल सिंह
सदा धीरज का दामन थामे चाहे समय कितना भी अनुकूल या प्रतिकूल हो सम भाव
संदेशों का आदान प्रदान करते अपूर्व सिंह घर के प्रांगण में धीरज का दामन थामे

छत्तीसगढ़ के चार महत्वपूर्ण स्तम्भ पार्श्व में मैकल श्रंखला का अकेला पर्वत दल्हा
पद्म श्री अनुज शर्मा, श्री ललित शर्मा {ब्लॉगर } और श्री अशोक तिवारी जी { पुरातत्व विभाग }
अरे आदरणीय आप कहाँ खो गये ये हमें देखने लगे परदे के पीछे चित्रकार हम हैं जी
बस हमने TAB 3 से कैद कर लिया अपने सपने को जो आज हक़ीक़त में आ गई
 एक सुख दुःख की  चर्चा जहां झलकता  और बहती स्नेह, आत्मीयता की  मीठी बयार सुनहरी धुप संग

 ये लुकाछिपी मैना का चित्र खीचते बखत कहीं उड़ न जाये ये अंदाज़ भी भा गया मन को
और खींच गया चित्र मैना संग लाल फूल सेमल के कटघरी प्रवास पर चलते चलते

प्रेम की इंतहा मैना और धुप ने अच्छे फोटो के लिए बैठने को कलाकार को पेड़ से बाँध दिया
ये समय लगा कैमरा, लाइट, साउंड और एक्शन का समय का चक्र घुम चला अनवरत

अनुज बाबू का प्रेम हमारे लिए भी छलका हम भी सराबोर हो गए और मर गए सादगी पर
क्या कहूं कुछ भी कम हैं ऐसे लोग लाखों में एक और सदियों में जन्म लेते हैं छत्तीसगढ़ में
पसंद भी तो श्री राहुल कुमार सिंह की हैं कइसे अनुज बाबू भला तुंही बतावा जी गल्ती कहें का जी

एक बार सोचने लगा छत्तीसगढ़ का पर्याय कौन निर्णय मेरे लिए कठिन आप अपनी जानो जी

कोटगढ़ का मिट्टी का किला और खटोला सरस्वती शिशु मंदिर के बच्चे रम गये नैसर्गिक कलाकार में
एक क्लास ले ली और जीवित उठे मया फ़िल्म के गीत और दृश्य शुरू हो गया सिलसिला गीतों का
कोटगढ़ के किला को कैमरे में  करते अनुज बाबू संग में कैद हो गये सदा के लिये
ब्लॉगर श्री ललित शर्मा जी और बड़े भैया श्री अशोक तिवारी जी जन्म जन्मों तक
भा गया राजेंद्र कुमार सिंह हायर सेकेंडरी स्कुल का विज्ञान प्रयोग शाला मगन हो गए
जीवों के सुरक्षित किये गये बोतलों में जीवंत हो उठे विद्यालय के अनमोल क्षण
विज्ञान प्रयोगशाला को मूर्त रूप देने में पूर्व प्राचार्य श्री रामचंद्र मिश्रा जी का मार्गदर्शन
अनुज बाबू आयें और और युवराज सिंह स्वागत में खड़ा न हो कैसे बनेगा मिल गया आशीर्वाद
कौन किसे कितना प्यार करता है बता पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हैं छत्तीसगढ़ में
ललित शर्मा { भाई जी } अकलतरा आयें और शानू को स्नेह न मिले मुछ वाले मामा जी
अकलतरा स्थित जिमखाना में ललित भाई और अनुज बाबू की उपस्थिति ने मन को मोह लिया 

राजेद्र कुमार सिंह सभा भवन में टंगे वैज्ञानिकों की उपलब्धियां और जीवन वृत्त को बाँचते
सराहना की ऐसे सुन्दर संयोजन की जिनसे लोग और विद्यार्थी प्रेरणा प्राप्त करेंगे
विदाई का समय हर्ष घर आने का और दुःख जल्द ही चले जाने का मेरी कुटिया को पवित्र किया
बड़े भैया अशोक तिवारी, ललित भाई और सदा मुस्कुराते पद्म श्री अनुज शर्मा जी ने
मेरा सौभाग्य इन आत्मीय जनों कि उपस्थिति मेरे घर

समर्पित श्री ललित शर्मा lalitdotcom के सर्जक को
आप सबका स्नेह और मार्गदर्शन सदा साथ रहा

१२ मार्च २०१४

Thursday, 9 May 2013

सारथी / रथी भाग १

सारथी 
हे अच्युत
मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिये, ताकि मैं देख सकूँ ............

महाभारत के युद्ध में ग्यारह अक्ष्रोनी सेना के बदले बिना अस्त्र शस्त्र के यशोदानंदन
अर्जुन के सारथी बन गये  दुर्योधन ने नहीं माँगा चक्रधारी कन्हैया को जिसने रचा था
युद्ध जय पराजय का कैसी विडंबना है हम बिसरा देते है मूल पात्र को ठीक नींव की
पत्थर की तरह वजूदहीन मानकर जबकि यही होते हैं **किंग मेकर**

त्रेता युग में राजमाता कैकेयी बनी थी सारथी राजा दशरथ संग देवासुर संग्राम में और
रथ का पहिया गिरने से बचाने के लिये बना दी थी खूंटी उंगली की जिसमें भरा था
अमृत अमरत्व हेतु किन्तु सारथी थी।

द्वापर में बने सारथी मुरली मनोहर महाभारत रचने और कुरु वंश के विनाश के लिये?
शल्य और शिखण्डी सारथी बन युद्ध को दे गये नयी दिशा धर्म और अधर्म बीच?
पाण्डवों  के अज्ञातवास में बृहन्नला अर्जुन को भी बनना पड़ा था सारथी उत्तर कुमार का
युद्ध के बीच बदलकर भूमिका बदल दी गई युद्ध की दिशा और दशा समाप्त कर अज्ञातवास

अयोध्या नरेश ऋतु पर्ण के सारथी राजा नल बाहुक के क्षद्म नाम अश्व सारथी बन
अश्व सञ्चालन कला का ज्ञान कराया  और उनसे द्युत विद्या में प्रवीणता प्राप्त कर
पुनः अपनी यश कीर्ति राजा पुष्कर से वापस पाई।

सारथी कौन हो सकता है?
रथी के सामने बैठे, रथ का सञ्चालन विपरीत परिस्थिति में भी उपयुक्त कर रथी की रक्षा करे,
अनुकूल परिस्थिति में शत्रु के समीप रथ लाकर रथी को सांघातिक प्रहार करने का अवसर उपलब्ध कराये
और करे यथा काल अस्त्र शस्त्र की आपूर्ति युद्ध और प्रतिरक्षा में
समन्वय या कहें तादात्म्य स्थापित कर दे बिन कहे पूछे रथी के
हो युद्ध निपुण, रणनीति में पारंगत धर्म अधर्म का ज्ञान रख निर्विकार

सुझाव और उत्साहवर्धन बिन श्रेय की आसक्ति के

मानव जीवन में शरीर रथ की भांति , इन्द्रियाँ घोड़े की तरह , रास इन्द्रियों पर नियंत्रण के लिये और मन सारथी सा और इन सारे से युक्त आत्मा रथी की तरह भोक्ता होती है इसमें किसी का भी महत्व किसी से भी कम कहाँ होता है सब होते हैं अन्योन्यश्रित इन्द्रियों से उत्पन्न इक्षाओं और रथी द्वारा इनके शास्त्र सम्मत भोग के मध्य संतुलन सारथी ही साधता है अतः सैद्धांतिक रूप से सभी का महत्व समान होते हुए भी व्यावहारिक रूप से सारथी सर्वोपरि होता है।

यदि रथ ही नहीं रहा तो रथी युद्ध स्थल पर कैसे पहुचेगा?
घोड़े नहीं हुए तो रथ को गति कौन देगा?
रास न हो तो घोड़े अनियंत्रित होकर रथ को ही नष्ट कर देंगे
सारथी ही नियंत्रित करता है रथ और घोड़े को लक्ष्य तक?
और इन सभी उपादानों से युक्त रथ पर रथी  रूपी आत्मा ही नहीं रही
तब इनका उपभोग कौन करेगा?

रथ, घोड़ा, रास, सारथी, रथी, अस्त्र शस्त्र, और शत्रु संग युद्ध में जय पराजय निर्धारित करने की स्थिति में होता है सारथी जो सदैव श्रेय से वंचित रहते हुए भी सदैव रत और प्रस्तुत होता है अपने कर्म में

सारथी
बस सारथी
और सारथी

शेष अगले अंक में

आदरणीय प्रतुल वशिष्ठ जी
भारत भारती वैभवं के सर्जक श्रेष्ट
को समर्पित वादे के मुताबिक

Saturday, 13 April 2013

विक्रम वेताल १२

** जाने क्या ढूढ़ती रहती हैं ये आँखें मुझमे राख के इस ढेर में शोला है न चिंगारी है **


गतांक से आगे

अब तक आपने पढ़ा ...वेताल को गुड़ाखू की तलब फिर जागृत हो गई और वह कुएं की जगत पर गुड़ाखू घिसने बैठ गया........................

अब आगे

विक्रमार्क लघुशंका निवृति के बहाने थोड़ी दूर जाकर भूतकाल में जाने का सद्य: प्राप्त मन्त्र पढ़ने लगा।
तत्क्षण सब कुछ आँखों के सामने चलचित्र सा स्पष्ट हो गया। प्रसन्नता पूर्वक वह वेताल के पास जा  पहुंचा और उसे कंधे पर लाद रेलवे के अनमैन्ड खोंड फाटक की ऒर चलना आरम्भ किया

राजन ने कहा हे वेताल
अब जो मैं कहता हूँ ध्यान पूर्वक सुनो
इस जीव की पिछली पीढ़ी भारतीय रेल की सेवा करते देश के विभिन्न भू-भागों से गुजरी, वहां के निवासियों के गहन संपर्क में आई और इस जातक के जन्म में यथा शक्ति सभी भू -भागों के निवासियों ने अपना योगदान दिया। उसी के परिणामस्वरूप भारत की अनेकता में एकता जैसे शारीरिक लक्षणों से युक्त इस जीव का जन्म हुआ। कालान्तर में व्यक्तित्व विकास के अलग-अलग चरणों से गुजरते हुए रोजी रोजगार चलाने की प्रक्रिया में अचानक उसने पाया कि अंततः वह रचनाकार उर्फ़ पत्रकार जैसा कुछ बन गया।

तत्पश्चात यह जीव अलग-अलग पाला, खूंटा, मालिक, विचार ,निष्ठा बदलते हुए एक दिन सड़क पर छोटी सी भीड़ के पीछे जा लगा और संस्कृत कथा में पांडित्य प्राप्त अभिमानी चार ब्राह्मण युवकों सदृश्य " महाजनो येन गत: स पन्थाः" का अनुसरण करते हुए अपने को जीवन के अंतिम पड़ाव, श्मशान के वीराने में भ्रमित, चकित और अनाथ सा महसूस करते हुए खड़ा पाया। कुछ समय चहुँऒर देखने पर उसकी नज़र श्मशान में दूर खड़े कालिया नामक गर्दभ पर पड़ी, जिसे देखकर उसे उपरोक्त वर्णित ब्राह्मण युवकों की तरह एक दुसरे श्लोक-- निर्जन और वीराने में मिलने वाला जीव अपने बंधू के समान होता है का स्मरण हो आया, तत्काल ही उसके ह्रदय में किसी दैवीय प्रेरणा से बंधुत्व भाव जागृत हो गया। इस चौपाये के समीप पहुँच अपना परिचय देकर भातृभाव से पूछा-- हे रजक सहायक बन्धु श्रेष्ठ कृपाकर अपना परिचय सहित मार्गदर्शन दें।
हे वेताल,वैशाखनंदन ने अपना सक्षिप्त परिचय देते हुए जो कहा वह कथा इस प्रकार है---

यह कालिया गर्दभ अपने पुराने काम और मालिक को छोड़कर पलायित हो  " द ग्रेट  इन्डियन गंगा जमुना सर्कस" के विशाल पंडाल के समीप पहुँच अपना राग छेड़ने लगा। सर्कस मालिक के युवा बेटे को उसका यह राग नए किस्म के रिमिक्स की तरह जान पड़ा और उसने इस सड़कछाप जीव को अपने सर्कस में पनाह दे दी। सर्कस जब एक शहर से दुसरे शहर जाता तब कालिया बोझ ढ़ोता और सर्कस में दो करतबों के बीच फिलर के रूप में आकर दर्शकों को * गर्दभ रिमिक्स * सुनाकर उनका मनोरंजन करता। समय के साथ सर्कस के पुराने मालिक का इंतकाल हो गया और सर्कस को जगह -जगह ले जाने में बढ़ते खर्च के मद्देनजर मालिक के युवा पोते ने सर्कस को चिड़ियाघर में तब्दील कर स्थाई रूप से देश की राजधानी दिल्ली में स्थापित कर दिया।

गुजरते समय के साथ कालिया को चिड़ियाघर का मैनेजर बना दिया गया किन्तु कालिए को वहां की तमाम सुविधाओं के बीच अपने शहर की याद सताती तो वह कुछ दिनों की छुट्टी लेकर यमुना और गंगा के तट पर बसे अपने पुराने शहर में बिताता और पुराने मित्रों से मिलता। उन दिनों को याद करते धोबी घाट पर जाता और तात्कालिक समय की यौवन से पूर्ण की गदहियों की चुहलबाजियों की मीठी यादों में खो जाता, विशेष कर रानी नामक गधी की जो प्रचुर यौवन से भरी और सर्वाधिक ज्ञानवान थी जिस पर कालिया जी जान से फ़िदा था पर वह घास नहीं डालती थी किन्तु प्रियदर्शन नामक एक अन्य गर्दभ को अपना दिल दे बैठी थी और उसे "गर्दभ कुल कमल दिवाकर" मानती थी, का स्मरण होता तो वह श्मसान रोदन को विवश हो जाता।

कभी कभी वह हरिश्चद्र घाट की ऒर निकल  जाता और गला खोलकर अपने जन्मजात राग में रेंकने लगता ऐसे ही एक प्रवास पर सोनपुर के इस विचित्र जीव को उसने देखा, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है, इस मानवीय लक्षणों के काकटेल सदृश्य दुर्लभ जीव को पाकर कालिये के ह्रदय में भी वैसा ही बंधुत्व भाव जगा जैसा सोनपुर के इस विचित्र जीव में जागृत हुआ था

इस सोनपुरिया जीव का परिचय जानने उपरांत कालिए के मन में यह विलक्षण विचार कौंधा कि यदि वह इस विचित्र जीव के साथ अपना राग मिलाकर रीमिक्स रिकार्ड करवाये तो यह नूतन प्रयोग निश्चय ही बिकाऊ होगा, भले टिकाऊ न हो।परन्तु यह गान इस जीव का अंतिम गान बना .चिड़ियाघर के मालिक ने इस जीव के साथ अपने पुराने कर्मचारी कालिए को भी बाहर का रास्ता दिखाया। कालिये के साथ उसकी यह जुगलबंदी टिकाऊ साबित सिद्ध नहीं हुई। अलग -अलग मीडिया ठिकानों से यह जीव मालिकों के साथ विश्वासघात के दंड स्वरुप  नेपथ्य पर ** तात लात मोहिं मालिक मारा ** जैसे पाद प्रहार से प्रताड़ित हो हंकाला जाकर सोनपुरा के निकट नव निर्मित प्रदेश छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आकर  मौत की पदचाप सुनते,वनों में चरने वाले पृथ्वी पर भार, हिरणों के स्वरुप अपने निरर्थक, दोगलेपन से भरे उपेक्षित जीवन का दंश झेलते अपना अंतिम समय बिताने लगा

अक्सर जब लोग इवनिंग वाक करते उसके घर के पास से गुजरते तो उन्हें ६0के दशक के पुराने गीत की पंक्तियाँ ** जाने क्या ढूढ़ती रहती हैं ये आँखें मुझमे राख के इस ढेर में शोला है न चिंगारी है **सुनाई पड़तीं
इस विचित्र जीव के जन्म रहस्य का इस प्रकार वर्णन कर राजन ने अपना उत्तर समाप्त किया ।


राजन का उत्तर समाप्त होते -होते वे रेलवे के मानवरहित खोंड फाटक तक आ पहुंचे।
अचानक खट्ट की आवाज़ हुई राजन ने झुक कर देखा तो गुड़ाखू की डिब्बी ज़मीन पर गिरी पड़ी थी।

वेताल ने कहा हे विक्रमार्क


मेरी सीमा यहीं समाप्त होती है। आगे दुसरे वेताल का क्षेत्र है और हम मानवों सदृश्य एक -दुसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करते,गुड़ाखू और मानिकचंद के पाउच के लिए धन्यवाद,
***यू आर रियली जीनियस *** 
कहकर सोनपुरा की रात के अंतिम पहर की निस्तबधता को अट्टहास से तोड़ता हुआ जूठही रेल्वे लेवल क्रासिंग के पास के बूढ़े पीपल की सबसे ऊंची डाल पर जाकर लटक गया

इति कथा।

Monday, 1 April 2013

विक्रम वेताल ११




सुधि ब्लॉग के सृजन कर्ता से विनम्र आग्रह  कि परती परीकथा, गोदान, उसने कहा था, मृत्युंजय, रामायण, रामचरितमानस, महाभारत,जैसे किसी भी ग्रन्थ का मान और मूल्य मानवीय धरातल पर सदा सर्वकालिक, सर्वमान्य, सर्वग्राह्य है चाहे हम उसे कथा कहें या उसे पौराणिक काल्पनिक कथा मानें लेकिन जब कभी सड़ांध फैलाती कोई घटिया काल्पनिक साहित्य *फ्रंट लाइन* का सर्जन होगा विक्रम वेताल को कंधे पर लाद निकल पड़ेगा यात्रा में ............भले ही कुछ लोग जान पायेंगे पात्र, परिस्थिति, देश, और काल


विक्रमार्क ने हठ न छोडा और लटिया के जुठही फाटक के पास के बूढ़े पीपल से वेताल के शव को उतार, सोनपुरा की ऒर रेल पांतों के साथ-साथ चलने लगा। चलते-चलते वे सोनपुरा  के पश्चिमी रेल केबिन तक आ पहुंचे ,पर ख़ामोशी छाई रही.

रेल पांत के किनारे पानी से भरे जोहड़ देख वेताल ने चुप्पी तोड़ी और कहा -जरा सुस्ती सी हो रही है, हाथ भट्टी की कच्ची का हैंगओवर तनिक ज्यादा देर तक रह जाता है कभी - कभी। फिर ठंडी आह भर कर बोले हमारे ज़माने में कितने ही किस्म और ब्रांड के गुड़ाखू मिलते थे। मंदिर,हाथी ,बन्दर,तोता और गाय छाप . दो -तीन तो " मेड इन सोनपुरा " ही थे।,

खैर गुजरे ज़माने की बातें हैं। जरा देखना तुम्हारी जेब में कोई खैनी पाउच पड़ा हो, अरे तुम तो मानिकचंद ही खाते होगे, राजन ने एक पाउच फाड़ वेताल को ससम्मान पेश किया और कहा-नोश फरमाइए,वेताल झिड़कता सा बोला तुम्हारी जात बदल रही है, सोनपुरा के एक युवक की तरह,कायदे से तुम्हे कहना चाहिए- आरोगिये।

चलो आज मैं तुम्हे सोनपुरा  की कहानी सुनाता हूँ।
मैं संजय की सी दृष्टि क्षमता,जो भूत दिखाती है,थोड़ी देर के लिए तुम्हें देता हूँ ,कहकर रहस्यमयी आवाज में दुहराने लगा वर्तमान की दीवारें हट जाओ,बाधाएँ दूर हो जाओ और चार दशक पीछे जाओ। फिर एक मन्त्र सा पढ़ते हुए कहा-राजन आँखें बंद करो, हाथ फैलाकर कहो-ॐ फट,गुड़ाखू की डिब्बी ला फटाफट। राजन ने जब मन्त्र दुहरा कर आंखे खोली तो मेड इन सोनपुरा गुड़ाखू की एक डिब्बी हाथ पर थी,

राजन आश्चर्यचकित हो गदगद स्वर में बोले-गुरु जब आप अभी भी भूत काल में जाने और उस गुजरे कल के किसी प्रोडक्ट को पैदा करने की ताकत रखते है, तब जोहड़ में पानी देख ठंढी आहें क्यों भर रहे थे।
वेताल ने कहा,हे राजन वेताल किसी चीज़ की इच्छा कर तो सकते है पर जीवित मानव के सहयोग बिना उसे नहीं प्राप्त कर सकते,न ही वापर सकते, टेशन कुए की जगत पर चैन से गुड़ाखू घिसने पश्चात् बोले
" नाऊ आई एम फीलिग़ फ्रेश"

विक्रम उन्हें पुन :कंधे पर लादकर पलेटिअर बंगले की दिशा में बढ़ चला। वेताल ने रेलवे क्वाटर्स की दिशा में इशारा करते हुए कहा-उस अजीब से जीव को देखो,पैर के पंजे आदिमानव से छितराए,पतली टांगों पर टंगी बनिए सी झूलती तोंद,कृष्ण के राज्य द्वारिका के निवासियों सदृश्य गोल मटोल चेहरा, द्रविड़ देश के लोगों जैसे बाल और मछली सी गंध लिए उत्पन्न मनुष्य तन को मैं तुम्हारे ज्ञान,अंतरदृष्टि और सूझ की परीक्षा लेने पूछता हूँ,क्या जान सकते हो इस मानव काकटेल कृति का जन्म रहस्य।

विक्रमार्क सोच में पड़ गया,कई ख्याल आ रहे थे पर स्पष्ट और निश्चयपूर्वक कहने हेतु किन्तु कुछ भी तय नहीं हो पा रहा था। अब तक वे अकलतरा स्थित रा. कु. उ. मा. शाला के कुएं तक आ पहुंचे थे वेताल को गुड़ाखू की तलब फिर जागृत हो गई और वह कुएं की जगत पर गुड़ाखू घिसने बैठ गया

अगले अंक में समापन

चित्र गूगल से साभार
01. अप्रेल २०१३ 

Wednesday, 27 March 2013

विक्रम वेताल १०/ नमकहराम

नज़रें मिला लोगों से, तेरी जात और औकात का पता
ये तेरे पैरों के निशां, खुद ब खुद बोल जायेंगे बिन पूछे 


आज होली पर
राजा विक्रम
जैसे ही दातुन मुखारी के लिए निकला
वेताल खुद लटिया के जुठही तालाब के
पीपल पेड़ से उतर कंधे पर लद गया
दोनों निकल पड़े नगर के रेल्वे फाटक की ओर
रास्ते में एक क़स्बा मिला

सोनपुरा

राह में एक जीव देखकर
वेताल जिज्ञासा से भर उठा
सांवला थुलथुल शरीर, खिचड़ी बाल
साउथ इंडियन लुक किन्तु बंगाली मिक्स

वेताल ने राजन से कहा
राजन

मै हमेशा एक कहानी सुनाता हूँ
और आप मौन रहकर मेरा माखौल उड़ाते हो
किन्तु आज ऐसा नहीं करने दूंगा
आज की कहानी
किसी नमकहराम जीव से सुनें
किन्तु प्रश्न मैं ही पूछूँगा

आज सही उत्तर चाहिए
विधान सभा में प्रजाहित में
आज आपके
ज्ञान और सत्य की परीक्षा है

जो स्वीकार करता है
अपना गलिजपना
और एहसान फरामोशी
बिसरा दिया जिसने मिट्टी का क़र्ज़
और मृत्यु के बाद
करता है मिथ्या आरोप प्रत्यारोप
इस दोगले जीव को
किस जाति से पुकारें?

राजन
मुझे भारतीय होने पर गर्व है
तुम्हे उज्जैनीय होने पर गर्व है
तो इसे
अकलतरा निवासी होने पर गर्व क्यों नहीं?
क्या इसने या इसके पूर्वजों ने वहां भीख मांगी थी?

जिस मिट्टी में पला बढ़ा
जहाँ शिक्षा पाई
अन्न खाया गरीबी में भी
क्या संलिप्त रहा किसी दुष्कर्म में?

विस्मृत कर दिया
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि .....?
या लोग पहचान लेंगे इस भिखारी को?
चलो कर दें अकलतरा को सोनपुरा?

मुझे कभी भी आपने पेड़ से उतार कर
जमीं पर पटका नहीं
बार बार कंधे पर लाद निकल पड़ते हो
नई कथा की तलाश में

राजन
ज़रा गौर करो इसके महान चरित्र पर
जिसे सोलह जगह से लात मारकर भगाया गया
राजधानी दिल्ली से भी सत्ताच्युत किया गया
सब कुछ सीखा अपनी भाभी से?
रिश्तों को ताक़ पर रखकर

और अब सिखाता है दुनिया को सदाचार का पाठ
अंपने ही भाई से विश्वासघात करके

नंगा नहाये निचोड़े किसको पहने किसको?

ज़रा पूछो इस टुच्चे से
थप्पड़ खाकर कहानी लिख लोगे?
छिछोरेपन से पेट कब तक भरोगे?
रहोगे सूअर के सूअर?

संस्कारों में जो मिला?
वही न दृष्टिगोचर होगा

विक्रम उद्विग्न हो उठे
गन्दी सुकर कथा सुनकर
जैसे ही म्यान से तलवार खीची
और कहा
किस नमकहराम की कथा सुना रहे हो?

राजा विक्रम का मौन भंग हुआ
वेताल खी खी करते हुए नंगे पैर भाग निकला
जुठही तालाब के बट वृक्ष की ओर
और जाकर खुद लटक गया

राजन
बुरा न मानो होली है?

चित्र गूगल से साभार

अकलतरा की माटी, विद्यालय, गुरुजनों,और निवासियों को समर्पित
जिनके प्रेम और मार्गदर्शन से मेरे गुण और अवगुण का विकास हुआ।

Sunday, 16 September 2012

अकलतरा सुदर्शन

सुबह सकारे अशोक बजाज जी के ग्राम चौपाल पर पढ़ा श्री के सी सुदर्शन जी नहीं रहे
घूम गया बचपन, झनझना गया शरीर, टूट गई तन्द्रा, जी उठे पल
एक सौम्य, शांत, गठीला, धीर, गंभीर व्यक्तित्व मानस पटल पर
अकलतरा के साफ सुथरे सड़क पर अपने बालसखा लल्ला जी संग

स्व दुखीराम ताम्रकार लल्ला भैया, रमेश कुमार दुबे, स्व नर्मदा प्रसाद देवांगन,
पुनीत राम देवांगन, हीरालाल देवांगन, जगदीश अग्रवाल कुकदिहा, पुनीत राम
सूर्यवंशी, संग स्व प्रताप सिंह जी ये सब बालसखा अपने परंपरागत गणवेश में
शामिल नज़र आये धुंधले धुंधले से, स्टेशन के सामने चट्टान पर संघ दक्ष कराते

स्मृति में घूमने लगे बड़े बुजुर्ग श्री रामाधीन जी दुबे, शिवाधीन जी दुबे, नर्मदा
प्रसाद दुबे जी, भुवन प्रसाद दुबे जी, स्व पुकराम जी, रामलाल जी जायसवाल
लम्बी फेहरिस्त में शामिल थे राधेश्याम शर्मा, स्व छगन लाल शर्मा, शेखर दुबे,
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि ... ... प्रार्थना करते कभी गोल घेरे में राष्ट्रगान

अकलतरा का प्रतीक दल्हा पहाड़ या दल्हा प्रतीक मैकल श्रृंखला का एकमात्र
अकेला पर्वत आज सदियों से लोगों को आकर्षित करता अचल, अडिग, मौन
समय का साक्षी जिसे नागपंचमी को उलटे तरफ से चढ़ने का साहस किया
शायद 1955 56 में सुदर्शन जी संग लल्ला भैया, रमेश दुबे, प्रताप सिंह जी,
अपने बालमित्रों की टोली बना जो आज भी परंपरा में शामिल हर बरस

शांतिलाल पुरोहित जी का आवास, चूना भट्टा के समीप जहाँ की शान्ति
विस्तृत मैदान बौद्धिक चर्चा को विस्तार देती शामिल रहते सुबह की किरणें
लटिया, कल्याणपुर से कोटमीसोनर की पगडण्डी आज भी साक्षी भाव से
स्मरण करते श्री के सी सुदर्शन जी को भीगी आँखों से भाव भीनी श्रद्धांजली ले

बाल ब्रह्मचारी सुदर्शन जी का अपनत्व अकलतरा से ऐसा जुड़ा कि वो
यहाँ के हो गये और अकलतरा उनका हो गया, आपको रायगढ़ संघ के
प्रचार और प्रसार का दायित्व सौपा गया और श्री यादव राव कालकर जी
को बिलासपुर का प्रभार दिया गया बिलासपुर का संघ कार्यालय का नामकरण
कालकर के ही नाम पर किया गया है. दो कुर्ता, दो धोती, दो बंडी, दो लंगोट, और
एक गमछा कुल संपत्ति. जो मिला खा लिया, कोई मांग नहीं, कोई शिकायत नहीं

शायद नागपुर के बाद अकलतरा को संघ का दूसरा या तीसरा बड़ा केंद्र कहना अति नहीं होगा
तिलई निवासी स्व श्री गौरीशंकर कौशिक जी को भी याद करना ज़रूरी रहा
ग्राम तिलई भी संघ संचालन का ग्रामीण केंद्र रहा जहाँ इन्हें असीम प्रेम मिला
अकलतरा रेलवे स्टेशन के सामने चावल मिल मैदान संघ संचालन का मूल केंद्र रहा

एक घटना का जिक्र किया गया जो उनकी सहनशीलता की पराकाष्ठा को
बतलाता है शायद ये वाकया हो बापू महात्मा गाँधी के हत्या के आसपास की
शिवरीनारायण में किसी सज्जन ने सुदर्शन जी पर हाथ उठा दिया कान का पर्दा
फट गया, खून निकल आया लोगों ने विरोध जताने को कहा किन्तु उन्होंने माफ़ कर दिया

अकलतरा सरस्वती शिशु मंदिर उद्घाटन के साथ ही साक्षी है इनका प्रेम
अपने बालसखा लल्ला भैया स्व श्री दुखीराम जी ताम्रकार के घर का गृह प्रवेश.
अकलतरा नगर और इनके सानिध्य में रहे जन उनके निधन का समाचार सुनकर
याद कर उठे उनका अकलतरा के प्रति निश्छल प्रेम और संघ की दीवानगी
दक्षिण भारतीय ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर सादगी की झलक दिखी उनके चरित में.

16.09.2012