गुरुकुल ५

# गुरुकुल ५ # पीथमपुर मेला # पद्म श्री अनुज शर्मा # रेल, सड़क निर्माण विभाग और नगर निगम # गुरुकुल ४ # वक़्त # अलविदा # विक्रम और वेताल १७ # क्षितिज # आप # विक्रम और वेताल १६ # विक्रम और वेताल १५ # यकीन 3 # परेशाँ क्यूँ है? # टहलते दरख़्त # बारिस # जन्म दिन # वोट / पात्रता # मेरा अंदाज़ # श्रद्धा # रिश्ता / मेरी माँ # विक्रम और वेताल 14 # विनम्र आग्रह २ # तेरे निशां # मेरी आवाज / दीपक # वसीयत WILL # छलावा # पुण्यतिथि # जन्मदिन # साया # मैं फ़रिश्ता हूँ? # समापन? # आत्महत्या भाग २ # आत्महत्या भाग 1 # परी / FAIRY QUEEN # विक्रम और वेताल 13 # तेरे बिन # धान के कटोरा / छत्तीसगढ़ CG # जियो तो जानूं # निर्विकार / मौन / निश्छल # ये कैसा रिश्ता है # नक्सली / वनवासी # ठगा सा # तेरी झोली में # फैसला हम पर # राजपथ # जहर / अमृत # याद # भरोसा # सत्यं शिवं सुन्दरं # सारथी / रथी भाग १ # बनूं तो क्या बनूं # कोलाबेरी डी # झूठ /आदर्श # चिराग # अगला जन्म # सादगी # गुरुकुल / गुरु ३ # विक्रम वेताल १२ # गुरुकुल/ गुरु २ # गुरुकुल / गुरु # दीवानगी # विक्रम वेताल ११ # विक्रम वेताल १०/ नमकहराम # आसक्ति infatuation # यकीन २ # राम मर्यादा पुरुषोत्तम # मौलिकता बनाम परिवर्तन २ # मौलिकता बनाम परिवर्तन 1 # तेरी यादें # मेरा विद्यालय और राष्ट्रिय पर्व # तेरा प्यार # एक ही पल में # मौत # ज़िन्दगी # विक्रम वेताल 9 # विक्रम वेताल 8 # विद्यालय 2 # विद्यालय # खेद # अनागत / नव वर्ष # गमक # जीवन # विक्रम वेताल 7 # बंजर # मैं अहंकार # पलायन # ना लिखूं # बेगाना # विक्रम और वेताल 6 # लम्हा-लम्हा # खता # बुलबुले # आदरणीय # बंद # अकलतरा सुदर्शन # विक्रम और वेताल 4 # क्षितिजा # सपने # महत्वाकांक्षा # शमअ-ए-राह # दशा # विक्रम और वेताल 3 # टूट पड़ें # राम-कृष्ण # मेरा भ्रम? # आस्था और विश्वास # विक्रम और वेताल 2 # विक्रम और वेताल # पहेली # नया द्वार # नेह # घनी छांव # फरेब # पर्यावरण # फ़साना # लक्ष्य # प्रतीक्षा # एहसास # स्पर्श # नींद # जन्मना # सबा # विनम्र आग्रह # पंथहीन # क्यों # घर-घर की कहानी # यकीन # हिंसा # दिल # सखी # उस पार # बन जाना # राजमाता कैकेयी # किनारा # शाश्वत # आह्वान # टूटती कडि़यां # बोलती बंद # मां # भेड़िया # तुम बदल गई ? # कल और आज # छत्तीसगढ़ के परंपरागत आभूषण # पल # कालजयी # नोनी
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Saturday, 30 November 2013

यकीन 3

मैं तुमसे बेइन्तहा नफ़रत करती हूँ

मैं यकीन करती गई
तेरे हर वादे पर
और तू
हर्फ़ दर हर्फ़
छलता रहा
अब मैं बस चाहती हूँ
खून के बदले खून
आंसूंओं से भीगा चेहरा
हर ज़ुल्म का हिसाब
दर्द के बदले दर्द
चौराहे पर बेइज्जती
शर्म से झुका चेहरा
हर अपमान का बदला
जो तूने बिन मांगे
बिन अपराध
मढ़ दिया माथे पर
लेकिन
क्या करूँ?
मैं तुमसे
बेइन्तहां मुहब्बत करती हूँ
तू जानता है
और तेरे ज़ुल्म की
इन्तहां बढ़ जाती है

लेकिन
आज
तुम जानते हो?
मैं तुमसे बेइन्तहा
नफ़रत करती हूँ

२० नवम्बर २०१३
सौजन्य से यकीन ब्लॉग के सर्जक से
चित्र गूगल के सौजन्य से 

Tuesday, 26 November 2013

परेशाँ क्यूँ है?

रमाकांत सिंह 

*
आसमां बादलों से परेशाँ क्यूँ है?
घर लोगों से बेवज़ह हैरां क्यूँ है?
ज़िन्दगी खुश है तेरे जानिब यूँ?
फिर ये चेहरा हंसीन वीराँ क्यूँ है?

**
रोशन है ये जहाँ दिल अन्धेरा क्यूँ है?
शोर दीवाली का फिर ये मायूसी क्यूँ है?
लोग खुश महफ़िल में आँखें नम क्यूँ है
जलजला आँखों में यूँ दिल बंज़र क्यूँ है

***
देख मुश्किलों में इन्सां मुस्कुराता क्यूँ है?
तैरकर दरिया में आज मन प्यासा क्यूँ है?
हर हंसीं चहरे पे हंसी है फिर मातम क्यूँ है?
राह अपनी आसां मंज़िल आज कांटे क्यूँ हैं

24  नवम्बर 2013
समर्पित मेरी ज़िन्दगी को
     

Saturday, 28 September 2013

मेरा अंदाज़

मेरा अंदाज़ जुदा, प्यार जतलाने का


बोल कानों को अच्छा लगे गीत बन गये
कभी कभी अर्थहीन बोल भी शामिल हो गये
और कभी कभी शब्द नहीं मात्रा भी अर्थ को अमर कर गये

हे कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव

इसे आप अलग अलग लय, सुर, ताल, राग में गाकर आनंद लीजिये
हर क्षण नवीन लगता है, आपका अंदाज़ जुदा होना चाहिए

कोशिश कर देखिये इस गीत को यदि थोडा भी ***?

मेरा अंदाज़ जुदा, प्यार जतलाने का
पा न पाया मैं तुझे, तुझ पे मिट जाने का
कैसा अंदाज़ तेरा, प्यार समझाने का
मुझको गर पा न सका, मुझ पे मिट जाने का?***


यही अंदाज़ मेरा प्यार जतलाने का
गर तुझे पा न सका , तुझ पे मिट जाने का

कैसा ये इश्क तेरा कैसा दीवानापन
कैसा अंदाज़ तेरा उस पे दीवानापन
ऐसा अंदाज़ तेरा और ये पागलपन
मिल न पाये गर कभी, गम को बतलाने का?***


मेरा अंदाज़ जुदा ,प्यार जतलाने का
पा न पाया मैं तुझे, तुझ पे मिट जाने का

कैसा अंदाज़ तेरा प्यार समझाने का
मुझको गर पा न सका, मुझ पे मिट जाने का?
*** 
कैसा रिश्ता ये  तेरा कैसा अनजानापन 
बोल न *** 
है जुदा प्यार मेरा उस पे दीवानापन 
चल *** 
साथ हम जी न सके ,साथ मर जाने का? 

29 april 2013
DEDICATED TO MY ZINDAGI

Saturday, 15 June 2013

ये कैसा रिश्ता है

ये कैसा रिश्ता है, जो हर पल रिसता है
ये कैसा रिश्ता है
जो हर पल रिसता है

मैं देखता हूँ
वक़्त को गुजरते
वक़्त को ही ठहरते
शाम को ढलते
रात को टहलते

क्यूँ देखता हूँ
तुमको बिछड़ते
कश्ती को डूबते
परछाइयों को पिघलते
अचानक तुम्हे हंसते

आज भी देखता हूँ
आसमां को बिलखते
जंगल को बहकते
रात को उगते
सुबह को सिसकते

मैं हर पल वेखता हूँ
खुद को सिमटते
आंसूओं संग बहते
नयनों को सहमते
धूप को ढलते

कल भी देखा था
छाँव को फैलते
रात को उगते
सुबह को बहकते
सपनों को उजड़ते

आज भी बरकरार
दर्द का उबलना
अक्स का सिमटना
जख्म का सिसकना
अश्क का बहना

आज भी होता है
तन्हाई संग रोना
तन्हाई में खिलखिलाना
आंसूओं को पी जाना
आँखों से ही कहना

14जून 2013
ज़िन्दगी संग चलते चलते
चित्र गूगल से साभार


Thursday, 6 June 2013

ठगा सा

ज़िन्दगी तेरा इंतजार आखरी साँस तलक 

*
ठगा सा रह जाता हूँ अकेला
जब तुम आँख चुराकर
मुझसे दूर चली जाती हो
फिर वापस न आने के लिये

**
दर्द कहाँ महसूस करता हूँ?
जब कोई अपना
बेगाना बनकर
मुस्कुराकर दिल दुखा जाता है

***
तिलमिला जाता हूँ
जब तुम आँखों में आंसू ले
पहाड़ी झरने सी
बह जाती हो मेरे ही सामने

****
सोचने लगता हूँ
जब दर्द तेरे हिस्से का
बाँट नहीं पाता
अपाहिज ज़िन्दगी ले

*****
नज़र आता नहीं
तेरा ही चेहरा
सामने रहकर भी
क्यूं धुंधला जाती है मेरी आँखे

******
धुंधला जाती है
आँखें मेरी
अश्क आँखों में तेरे
बर्फ से जम जाते है

*****
मौन हो जाता हूँ
यूँ अक्सर तन्हाई में
जब तेरी याद
किसी कोने में टहलती है

******
ज़िन्दगी तेरा इंतजार 
चंद लम्हों के लिये 
आखरी धड़कन में भी 
आखरी साँस तलक 

०६ जून २०१३
जिंदगी संग चलते चलते

चित्र गूगल से साभार

Tuesday, 21 May 2013

जहर / अमृत



बदला मिजाज़, माज़रा, या मंज़र तेरा
मेरा वहम हो जहर या अमृत चख लूं?

भोर की हवा में घुलने लगी आग
आसमां से बरसा जहर, अमृत बन
थम गई सागर के भीतर हलचल
झरने का जल चढ़ने लगा परबत
जेठ में चाँद नज़र आया दिन में
रात को सूरज उगा रोशनी के लिये
मरी मछली चढ़ी प्रतिकूल धारा में सहज

दुश्मनों ने मिलाये हैं हाथ हंसकर
आज बच्चे की हंसी लगी खोखली
मृत नयनों में जगी आस की सासें
लोगों ने टाला ताला लगाना घर में
सरे राह छू लिये चरन पुत्र ने पिता के
लोग आज मिलने लगे हैं गले प्रेम से
बेखौफ चलने लगी बेटीयां घर को अँधेरी राह पर

लोगों की हंसी शोकसभा में शामिल
तेरी आँखों में नमी, हाथ में फिर खंज़र
शेर डरकर लगे हैं चलने झुण्ड में बन में
साधु जा छिपे हैं किसी खोह में हंसते
आज नदियों ने भी बन्ध छीन लिये
गाय देती है लात दूध थन में हाज़िर
फल लगे हैं मेरे आँगन के पेड़ में फिर तन के खड़ा

मेरे मालिक मेरे मौला ये करिश्मा कैसा या करम है मेरा?
ये कायनात, ये बाशिन्दे तेरे, कौन जाने दर्द तेरा या मेरा?

२१ मई २०१३
चित्र गूगल से साभार
मेरे मन की ब्लॉग की सर्जिका
अर्चना चाव जी को सस्नेह समर्पित

Wednesday, 15 May 2013

भरोसा

I LOVE YOU SO MUCH 


*
एस. एम. एस. किया
आई लव यू सो मच
फिर रिंग किया
बड़ी बेचैनी से

प्रिये
तुम्हे एस. एम. एस. मिला?

ये पूछना प्रेमिका से ही
भरोसा उठ गया?

**
संविधान के नियमानुसार
चुना जिसे हमदर्द मानकर
सुख दुःख को बांटने
प्रजा तंत्र की राह पर

फिर ये कहना

सरकार चलेगी?
क्या खुद पर से उठ गया विश्वास?

***
चौराहे पर लगाकर सिगनल
लाल, पीला और हरा
कर दी सिपाही की नियुक्ति
मुसाफिर
रुकेगा या पार हो जायेगा?

तंत्र या नियम पर
रह गया विश्वास?

****
तुम्हे यकीं है
परमात्मा पर?

लेकिन

तुम जानती हो
मुझे तुम पर खुद से ज्यादा

कल उगेगा सूरज पूरब से ही
और डूब जायेगा पश्चिम में

भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा
न इम्तहान ले नेकी बदी की कभी

ये जमीं आसमां मिलेंगे क्षितिज पर ही
कभी फलक पे कभी लहरों में समंदर के

१० अप्रेल २०१३
ज़िन्दगी के संग चलते चलते

चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 1 May 2013

झूठ /आदर्श



झूठ आदर्श का पूरक है?
और आदर्श झूठ का संपूरक है?
झूठ ही आदर्श को स्थापित कर देता है?
आदर्श झूठ की जननी है?

जो सच है वह आदर्श है?
जो आदर्श है उसका कहीं भी अस्तित्व है?
जो है नहीं वही आदर्श
मृगमरीचिका की भांति?

बियावान ज़िन्दगी
सरपट
किन्तु कंटीली राहें
बेमौसम बरसात
झुलसता दिन
सर्द रात
खाली पेट
खुले हाथ

झूठ पर टिका सच

चंदामामा आयेगा
मालपुआ पकायेगा

हम सब खायेंगे?
हर रोज?

बिना नागा?

२५.०८.2०००
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 24 April 2013

अगला जन्म

मेरी ज़िन्दगी तेरे बिन ज़िन्दगी?


आसमान से एक परी उतरी
मैंने परी से कहा

तुम मेरी ज़िन्दगी हो


मैं तुम्हे बेइन्तहा प्यार करता हूँ
परी ने कहा मुझे मालूम है

परी ने अचानक एक दिन कहा

मुझे लगता है
अब मेरे जाने का वक़्त आ गया

कहाँ?

जहाँ से मैं आई थी

मैंने कहा
एक वादा करो

तुम्हारा अगला जन्म मेरे लिये
उसने कहा क्यों नहीं?

वादा रहा

अगला जन्म आपके लिये ही

इस स्वार्थी दुनिया में
इतना टूटकर आज चाहता कौन है?

१० अप्रेल २०१३
समर्पित मेरी ज़िन्दगी को

चित्र गूगल से साभार



Saturday, 13 April 2013

विक्रम वेताल १२

** जाने क्या ढूढ़ती रहती हैं ये आँखें मुझमे राख के इस ढेर में शोला है न चिंगारी है **


गतांक से आगे

अब तक आपने पढ़ा ...वेताल को गुड़ाखू की तलब फिर जागृत हो गई और वह कुएं की जगत पर गुड़ाखू घिसने बैठ गया........................

अब आगे

विक्रमार्क लघुशंका निवृति के बहाने थोड़ी दूर जाकर भूतकाल में जाने का सद्य: प्राप्त मन्त्र पढ़ने लगा।
तत्क्षण सब कुछ आँखों के सामने चलचित्र सा स्पष्ट हो गया। प्रसन्नता पूर्वक वह वेताल के पास जा  पहुंचा और उसे कंधे पर लाद रेलवे के अनमैन्ड खोंड फाटक की ऒर चलना आरम्भ किया

राजन ने कहा हे वेताल
अब जो मैं कहता हूँ ध्यान पूर्वक सुनो
इस जीव की पिछली पीढ़ी भारतीय रेल की सेवा करते देश के विभिन्न भू-भागों से गुजरी, वहां के निवासियों के गहन संपर्क में आई और इस जातक के जन्म में यथा शक्ति सभी भू -भागों के निवासियों ने अपना योगदान दिया। उसी के परिणामस्वरूप भारत की अनेकता में एकता जैसे शारीरिक लक्षणों से युक्त इस जीव का जन्म हुआ। कालान्तर में व्यक्तित्व विकास के अलग-अलग चरणों से गुजरते हुए रोजी रोजगार चलाने की प्रक्रिया में अचानक उसने पाया कि अंततः वह रचनाकार उर्फ़ पत्रकार जैसा कुछ बन गया।

तत्पश्चात यह जीव अलग-अलग पाला, खूंटा, मालिक, विचार ,निष्ठा बदलते हुए एक दिन सड़क पर छोटी सी भीड़ के पीछे जा लगा और संस्कृत कथा में पांडित्य प्राप्त अभिमानी चार ब्राह्मण युवकों सदृश्य " महाजनो येन गत: स पन्थाः" का अनुसरण करते हुए अपने को जीवन के अंतिम पड़ाव, श्मशान के वीराने में भ्रमित, चकित और अनाथ सा महसूस करते हुए खड़ा पाया। कुछ समय चहुँऒर देखने पर उसकी नज़र श्मशान में दूर खड़े कालिया नामक गर्दभ पर पड़ी, जिसे देखकर उसे उपरोक्त वर्णित ब्राह्मण युवकों की तरह एक दुसरे श्लोक-- निर्जन और वीराने में मिलने वाला जीव अपने बंधू के समान होता है का स्मरण हो आया, तत्काल ही उसके ह्रदय में किसी दैवीय प्रेरणा से बंधुत्व भाव जागृत हो गया। इस चौपाये के समीप पहुँच अपना परिचय देकर भातृभाव से पूछा-- हे रजक सहायक बन्धु श्रेष्ठ कृपाकर अपना परिचय सहित मार्गदर्शन दें।
हे वेताल,वैशाखनंदन ने अपना सक्षिप्त परिचय देते हुए जो कहा वह कथा इस प्रकार है---

यह कालिया गर्दभ अपने पुराने काम और मालिक को छोड़कर पलायित हो  " द ग्रेट  इन्डियन गंगा जमुना सर्कस" के विशाल पंडाल के समीप पहुँच अपना राग छेड़ने लगा। सर्कस मालिक के युवा बेटे को उसका यह राग नए किस्म के रिमिक्स की तरह जान पड़ा और उसने इस सड़कछाप जीव को अपने सर्कस में पनाह दे दी। सर्कस जब एक शहर से दुसरे शहर जाता तब कालिया बोझ ढ़ोता और सर्कस में दो करतबों के बीच फिलर के रूप में आकर दर्शकों को * गर्दभ रिमिक्स * सुनाकर उनका मनोरंजन करता। समय के साथ सर्कस के पुराने मालिक का इंतकाल हो गया और सर्कस को जगह -जगह ले जाने में बढ़ते खर्च के मद्देनजर मालिक के युवा पोते ने सर्कस को चिड़ियाघर में तब्दील कर स्थाई रूप से देश की राजधानी दिल्ली में स्थापित कर दिया।

गुजरते समय के साथ कालिया को चिड़ियाघर का मैनेजर बना दिया गया किन्तु कालिए को वहां की तमाम सुविधाओं के बीच अपने शहर की याद सताती तो वह कुछ दिनों की छुट्टी लेकर यमुना और गंगा के तट पर बसे अपने पुराने शहर में बिताता और पुराने मित्रों से मिलता। उन दिनों को याद करते धोबी घाट पर जाता और तात्कालिक समय की यौवन से पूर्ण की गदहियों की चुहलबाजियों की मीठी यादों में खो जाता, विशेष कर रानी नामक गधी की जो प्रचुर यौवन से भरी और सर्वाधिक ज्ञानवान थी जिस पर कालिया जी जान से फ़िदा था पर वह घास नहीं डालती थी किन्तु प्रियदर्शन नामक एक अन्य गर्दभ को अपना दिल दे बैठी थी और उसे "गर्दभ कुल कमल दिवाकर" मानती थी, का स्मरण होता तो वह श्मसान रोदन को विवश हो जाता।

कभी कभी वह हरिश्चद्र घाट की ऒर निकल  जाता और गला खोलकर अपने जन्मजात राग में रेंकने लगता ऐसे ही एक प्रवास पर सोनपुर के इस विचित्र जीव को उसने देखा, जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है, इस मानवीय लक्षणों के काकटेल सदृश्य दुर्लभ जीव को पाकर कालिये के ह्रदय में भी वैसा ही बंधुत्व भाव जगा जैसा सोनपुर के इस विचित्र जीव में जागृत हुआ था

इस सोनपुरिया जीव का परिचय जानने उपरांत कालिए के मन में यह विलक्षण विचार कौंधा कि यदि वह इस विचित्र जीव के साथ अपना राग मिलाकर रीमिक्स रिकार्ड करवाये तो यह नूतन प्रयोग निश्चय ही बिकाऊ होगा, भले टिकाऊ न हो।परन्तु यह गान इस जीव का अंतिम गान बना .चिड़ियाघर के मालिक ने इस जीव के साथ अपने पुराने कर्मचारी कालिए को भी बाहर का रास्ता दिखाया। कालिये के साथ उसकी यह जुगलबंदी टिकाऊ साबित सिद्ध नहीं हुई। अलग -अलग मीडिया ठिकानों से यह जीव मालिकों के साथ विश्वासघात के दंड स्वरुप  नेपथ्य पर ** तात लात मोहिं मालिक मारा ** जैसे पाद प्रहार से प्रताड़ित हो हंकाला जाकर सोनपुरा के निकट नव निर्मित प्रदेश छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आकर  मौत की पदचाप सुनते,वनों में चरने वाले पृथ्वी पर भार, हिरणों के स्वरुप अपने निरर्थक, दोगलेपन से भरे उपेक्षित जीवन का दंश झेलते अपना अंतिम समय बिताने लगा

अक्सर जब लोग इवनिंग वाक करते उसके घर के पास से गुजरते तो उन्हें ६0के दशक के पुराने गीत की पंक्तियाँ ** जाने क्या ढूढ़ती रहती हैं ये आँखें मुझमे राख के इस ढेर में शोला है न चिंगारी है **सुनाई पड़तीं
इस विचित्र जीव के जन्म रहस्य का इस प्रकार वर्णन कर राजन ने अपना उत्तर समाप्त किया ।


राजन का उत्तर समाप्त होते -होते वे रेलवे के मानवरहित खोंड फाटक तक आ पहुंचे।
अचानक खट्ट की आवाज़ हुई राजन ने झुक कर देखा तो गुड़ाखू की डिब्बी ज़मीन पर गिरी पड़ी थी।

वेताल ने कहा हे विक्रमार्क


मेरी सीमा यहीं समाप्त होती है। आगे दुसरे वेताल का क्षेत्र है और हम मानवों सदृश्य एक -दुसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करते,गुड़ाखू और मानिकचंद के पाउच के लिए धन्यवाद,
***यू आर रियली जीनियस *** 
कहकर सोनपुरा की रात के अंतिम पहर की निस्तबधता को अट्टहास से तोड़ता हुआ जूठही रेल्वे लेवल क्रासिंग के पास के बूढ़े पीपल की सबसे ऊंची डाल पर जाकर लटक गया

इति कथा।

Wednesday, 3 April 2013

दीवानगी


राजा विक्रम अज्ञात वास में शायद परियों के देश में 

१*
पहले मेरे प्यार और नेमत के काबिल बन जा
फिर उठा हाथ सज़दे में या कुछ माँगने खातिर
२ **
मेरा इश्क मेरी दीवानगी मयखाने में नज़र आती है
कभी झाँका है उन आँखों को जिनमे डूबा उभरा फिर
३ ***
तुमने रुख से ज़रा नकाब ए हया क्या खींचा
लोग चिल्ला उठे तौबा ये क़यामत है या बला
४ ****
माना कि ज़िन्दगी हसीं है जानां
यूं जीना तेरे बगैर मुमकिन होगा?
५ *****
ये कैसी दीवानगी तेरी यूं दीवानापन
आये क्यूँ हर शै में तेरा अक्श नज़र
६ ******
कैसी दीवानगी तुम पर कैसा दीवानापन
के तेरे यादों में हरेक शै को भुल जाता हूँ
७ *******
कर बंद मुट्ठी ले समेट सारा जहां इसमें
हद फांदकर तू लगा जहां भी खुद बसेरा
८ ********
अभी रात है मैं मानता हूँ जानती है तू
सुबह होती ही है हौसला रख सूरज पर

९ *********
चुनी खुद राह अपनी फिर नज़रें नीची क्यूँ हैं?
शर्मिन्दगी फैसले पर या जहां को जान लिया?


चित्र गूगल से साभार
समर्पित मेरी  * जिंदगी * को
हर लम्हा जो मेरी सांसों में   

Monday, 1 April 2013

विक्रम वेताल ११




सुधि ब्लॉग के सृजन कर्ता से विनम्र आग्रह  कि परती परीकथा, गोदान, उसने कहा था, मृत्युंजय, रामायण, रामचरितमानस, महाभारत,जैसे किसी भी ग्रन्थ का मान और मूल्य मानवीय धरातल पर सदा सर्वकालिक, सर्वमान्य, सर्वग्राह्य है चाहे हम उसे कथा कहें या उसे पौराणिक काल्पनिक कथा मानें लेकिन जब कभी सड़ांध फैलाती कोई घटिया काल्पनिक साहित्य *फ्रंट लाइन* का सर्जन होगा विक्रम वेताल को कंधे पर लाद निकल पड़ेगा यात्रा में ............भले ही कुछ लोग जान पायेंगे पात्र, परिस्थिति, देश, और काल


विक्रमार्क ने हठ न छोडा और लटिया के जुठही फाटक के पास के बूढ़े पीपल से वेताल के शव को उतार, सोनपुरा की ऒर रेल पांतों के साथ-साथ चलने लगा। चलते-चलते वे सोनपुरा  के पश्चिमी रेल केबिन तक आ पहुंचे ,पर ख़ामोशी छाई रही.

रेल पांत के किनारे पानी से भरे जोहड़ देख वेताल ने चुप्पी तोड़ी और कहा -जरा सुस्ती सी हो रही है, हाथ भट्टी की कच्ची का हैंगओवर तनिक ज्यादा देर तक रह जाता है कभी - कभी। फिर ठंडी आह भर कर बोले हमारे ज़माने में कितने ही किस्म और ब्रांड के गुड़ाखू मिलते थे। मंदिर,हाथी ,बन्दर,तोता और गाय छाप . दो -तीन तो " मेड इन सोनपुरा " ही थे।,

खैर गुजरे ज़माने की बातें हैं। जरा देखना तुम्हारी जेब में कोई खैनी पाउच पड़ा हो, अरे तुम तो मानिकचंद ही खाते होगे, राजन ने एक पाउच फाड़ वेताल को ससम्मान पेश किया और कहा-नोश फरमाइए,वेताल झिड़कता सा बोला तुम्हारी जात बदल रही है, सोनपुरा के एक युवक की तरह,कायदे से तुम्हे कहना चाहिए- आरोगिये।

चलो आज मैं तुम्हे सोनपुरा  की कहानी सुनाता हूँ।
मैं संजय की सी दृष्टि क्षमता,जो भूत दिखाती है,थोड़ी देर के लिए तुम्हें देता हूँ ,कहकर रहस्यमयी आवाज में दुहराने लगा वर्तमान की दीवारें हट जाओ,बाधाएँ दूर हो जाओ और चार दशक पीछे जाओ। फिर एक मन्त्र सा पढ़ते हुए कहा-राजन आँखें बंद करो, हाथ फैलाकर कहो-ॐ फट,गुड़ाखू की डिब्बी ला फटाफट। राजन ने जब मन्त्र दुहरा कर आंखे खोली तो मेड इन सोनपुरा गुड़ाखू की एक डिब्बी हाथ पर थी,

राजन आश्चर्यचकित हो गदगद स्वर में बोले-गुरु जब आप अभी भी भूत काल में जाने और उस गुजरे कल के किसी प्रोडक्ट को पैदा करने की ताकत रखते है, तब जोहड़ में पानी देख ठंढी आहें क्यों भर रहे थे।
वेताल ने कहा,हे राजन वेताल किसी चीज़ की इच्छा कर तो सकते है पर जीवित मानव के सहयोग बिना उसे नहीं प्राप्त कर सकते,न ही वापर सकते, टेशन कुए की जगत पर चैन से गुड़ाखू घिसने पश्चात् बोले
" नाऊ आई एम फीलिग़ फ्रेश"

विक्रम उन्हें पुन :कंधे पर लादकर पलेटिअर बंगले की दिशा में बढ़ चला। वेताल ने रेलवे क्वाटर्स की दिशा में इशारा करते हुए कहा-उस अजीब से जीव को देखो,पैर के पंजे आदिमानव से छितराए,पतली टांगों पर टंगी बनिए सी झूलती तोंद,कृष्ण के राज्य द्वारिका के निवासियों सदृश्य गोल मटोल चेहरा, द्रविड़ देश के लोगों जैसे बाल और मछली सी गंध लिए उत्पन्न मनुष्य तन को मैं तुम्हारे ज्ञान,अंतरदृष्टि और सूझ की परीक्षा लेने पूछता हूँ,क्या जान सकते हो इस मानव काकटेल कृति का जन्म रहस्य।

विक्रमार्क सोच में पड़ गया,कई ख्याल आ रहे थे पर स्पष्ट और निश्चयपूर्वक कहने हेतु किन्तु कुछ भी तय नहीं हो पा रहा था। अब तक वे अकलतरा स्थित रा. कु. उ. मा. शाला के कुएं तक आ पहुंचे थे वेताल को गुड़ाखू की तलब फिर जागृत हो गई और वह कुएं की जगत पर गुड़ाखू घिसने बैठ गया

अगले अंक में समापन

चित्र गूगल से साभार
01. अप्रेल २०१३ 

Wednesday, 27 March 2013

विक्रम वेताल १०/ नमकहराम

नज़रें मिला लोगों से, तेरी जात और औकात का पता
ये तेरे पैरों के निशां, खुद ब खुद बोल जायेंगे बिन पूछे 


आज होली पर
राजा विक्रम
जैसे ही दातुन मुखारी के लिए निकला
वेताल खुद लटिया के जुठही तालाब के
पीपल पेड़ से उतर कंधे पर लद गया
दोनों निकल पड़े नगर के रेल्वे फाटक की ओर
रास्ते में एक क़स्बा मिला

सोनपुरा

राह में एक जीव देखकर
वेताल जिज्ञासा से भर उठा
सांवला थुलथुल शरीर, खिचड़ी बाल
साउथ इंडियन लुक किन्तु बंगाली मिक्स

वेताल ने राजन से कहा
राजन

मै हमेशा एक कहानी सुनाता हूँ
और आप मौन रहकर मेरा माखौल उड़ाते हो
किन्तु आज ऐसा नहीं करने दूंगा
आज की कहानी
किसी नमकहराम जीव से सुनें
किन्तु प्रश्न मैं ही पूछूँगा

आज सही उत्तर चाहिए
विधान सभा में प्रजाहित में
आज आपके
ज्ञान और सत्य की परीक्षा है

जो स्वीकार करता है
अपना गलिजपना
और एहसान फरामोशी
बिसरा दिया जिसने मिट्टी का क़र्ज़
और मृत्यु के बाद
करता है मिथ्या आरोप प्रत्यारोप
इस दोगले जीव को
किस जाति से पुकारें?

राजन
मुझे भारतीय होने पर गर्व है
तुम्हे उज्जैनीय होने पर गर्व है
तो इसे
अकलतरा निवासी होने पर गर्व क्यों नहीं?
क्या इसने या इसके पूर्वजों ने वहां भीख मांगी थी?

जिस मिट्टी में पला बढ़ा
जहाँ शिक्षा पाई
अन्न खाया गरीबी में भी
क्या संलिप्त रहा किसी दुष्कर्म में?

विस्मृत कर दिया
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि .....?
या लोग पहचान लेंगे इस भिखारी को?
चलो कर दें अकलतरा को सोनपुरा?

मुझे कभी भी आपने पेड़ से उतार कर
जमीं पर पटका नहीं
बार बार कंधे पर लाद निकल पड़ते हो
नई कथा की तलाश में

राजन
ज़रा गौर करो इसके महान चरित्र पर
जिसे सोलह जगह से लात मारकर भगाया गया
राजधानी दिल्ली से भी सत्ताच्युत किया गया
सब कुछ सीखा अपनी भाभी से?
रिश्तों को ताक़ पर रखकर

और अब सिखाता है दुनिया को सदाचार का पाठ
अंपने ही भाई से विश्वासघात करके

नंगा नहाये निचोड़े किसको पहने किसको?

ज़रा पूछो इस टुच्चे से
थप्पड़ खाकर कहानी लिख लोगे?
छिछोरेपन से पेट कब तक भरोगे?
रहोगे सूअर के सूअर?

संस्कारों में जो मिला?
वही न दृष्टिगोचर होगा

विक्रम उद्विग्न हो उठे
गन्दी सुकर कथा सुनकर
जैसे ही म्यान से तलवार खीची
और कहा
किस नमकहराम की कथा सुना रहे हो?

राजा विक्रम का मौन भंग हुआ
वेताल खी खी करते हुए नंगे पैर भाग निकला
जुठही तालाब के बट वृक्ष की ओर
और जाकर खुद लटक गया

राजन
बुरा न मानो होली है?

चित्र गूगल से साभार

अकलतरा की माटी, विद्यालय, गुरुजनों,और निवासियों को समर्पित
जिनके प्रेम और मार्गदर्शन से मेरे गुण और अवगुण का विकास हुआ।

Saturday, 23 March 2013

आसक्ति infatuation

ज़िन्दगी बता मेरी खता क्या है?
क्या मेरा तुझे टूटकर चाहना? 


*आसक्ति

ब्रज और मथुरा में
होली पर रंग गुलाल खेलते गोप गोपियाँ कहने लगे
यशोदानंदन मेरा है
किसी ने कहा बाँकेबिहारी
बस मेरा ही है तुम कहो?
मच गई धूम
सबने अपने रंगों में रंग दिया घनश्याम को बिन जाने कहके

*राधा* ने कहा
मैं नहीं जानती कृष्ण किसका है?
मैं तो बस इतना जानती हूँ कि
मैं जन्म जन्मों से कृष्ण की हूँ

** प्रेम

तेरी कुड़माई हो गई है?
देखता नहीं
ये रेशमी जड़ा हुआ शालू
इस बार
**उसने कहा था**
न शरमाई
न कहा धत
लहना सिंह लौटा गया था
लस्सी की दुकान से

अमर प्रेम कथा
चंद्रधर शर्मा गुलेरी की
शायद प्रेम में उत्सर्ग
वजीरा ज़रा पानी पिला
प्रेम में न्यौछावर होना लिखा था

***प्यार

मैं प्यार करता तुम्हे
अपनी ज़िन्दगी से ज्यादा

तुम मुझसे प्यार करती हो?

ऐ क्या बोलती तू?
आती क्या खंडाला?
ऐ क्या मैं बोलूं?
क्या करूँ आके मैं खंडाला?

समर्पण?
निष्ठा?
त्याग?
तपस्या?
शायद
प्रतिदान और प्रतिदान

२२ .०३ . २०१३
समर्पित मेरी * जिंदगी * को
जिसके बिना ज़िन्दगी अधूरी है

चन्दन ज्वेलर्स अकलतरा के कर्ता धर्ता
श्री मदन मामा जी की सुनाई कथा का लेखन

चित्र गूगल से साभार

Wednesday, 20 March 2013

यकीन २



मैं यकीन करती हूँ

ईश्वर पर
और उसके बनाये
दो कृतियों पर
नर और मादा

मादा और नर
परमात्मा ने बनाये
हमने अपनी खातिर गढ़े हैं
रिश्ते

रिश्ते
भगवान ने बनाये हैं?
हमने स्वीकार किये?
कुछ मन से
कुछ अनमने?

माँ ने कहा पिता है

हमने स्वीकार लिया भाई बहन
समाज ने लगवा दिए फेरे
बंध गये जन्म जन्मान्तर के बंधन में
मान लिया स्वामी जन्म जन्मों का?

मैंने बतलाया तो
तुम
मेरे पुत्र के पिता
मेरी बेटी के जन्मदाता
बायोलोजिकल
अन्यथा

क्या तो तुम?
क्या तुम्हारी हैसियत?

एक कथन से
बिखर जाते हैं रिश्ते?
टूट जाता है भ्रम
जननी जनक का?

मैं रिश्तों को जीती हूँ
मैं रिश्तों में जीती हूँ

तुम रिसतों को जीते हो
तुम रिसतों में जीते हो

चित्र गूगल से साभार

मौलिकता बनाम परिवर्तन की अंतिम कड़ी
समर्पित मेरी * ज़िन्दगी * को
ज़िन्दगी की जुबानी ज़िन्दगी की कहानी
अल्फाज़ उसके लेखनी मेरी

Tuesday, 12 March 2013

मौलिकता बनाम परिवर्तन २


चुनी खुद राह अपनी फिर नज़रें नीची क्यूं हैं?
शर्मिंदगी फैसले पर या जहां को जान लिया?
विवाह क्या है?
धर्म का धारण?

निजता की चाह?
धर्म धारण बार बार?
धर्म वरण वा परिवर्तन?
सजातीय विवाह में धर्म उल्लंघन?

वस्त्र की भांति बदलना न्याय संगत?

शास्त्रीय, लौकिक, व्यक्तिगत वा वैचारिक
परम्परागत, परिपक्व,
चिन्तनशील मेधा बने
निर्णायक और वाहक धर्म ध्वजा का?

एक धर्म का ज्ञान पूर्ण?
पश्चात् दुसरे धर्म का आश्रय ज्ञानार्जन में?
या बदलाव और तृप्ति के लिये?
किसी संकल्प या बहकावे में?

सभी धर्मों से निम्न पाया निज धर्म को?
धर्म निरपेक्ष जननी से पाई अनुमति?
दो अलग धर्मों की आत्मा एक संग?
संग संग विचरण, निर्वहन, निर्विकार भाव से?

चलो माना होगा सब सम्भव
दो विपरीत ध्रुवों का होगा अटूट बंधन?

एक नई सोच
धर्म ध्वज फहराने?
दे दें आहुति जीवन की?
धर्म भीरु बन?
या संभावनाओं पर?
कर दें अर्पण?
समय की मांग है?
बदलते मानदण्ड पर?
नई राह की खोज में?

जियो और जीने दो की चाह में?
नये युग के सूत्र पात्र में?

भुगत लेंगे?
सकारात्मक या नकारात्मक?
स्वेछाचारिता का फल भोगने?
स्वच्छंद उड़ने गगन में
बसाने अंतरिक्ष में नीड़

निज विवेक से?
अहम् की तुष्टि में?
कर लें गठबंधन?
अनमोल जीवन का?

बन जायें बरगद***

१२ मार्च २०१३
क्रमशः *ये रिश्तों की कड़ी है
*ये मेरी सोच का एक और पहलू
*अगली कड़ी में रिश्ते
समर्पित युवा पीढ़ी को जो सजातीय और विजातीय
प्रेम विवाह में विश्वास रखते हैं

चित्र गूगल से साभार

Friday, 8 March 2013

मौलिकता बनाम परिवर्तन 1



बचपन में किसी विद्वान का कहा वाक्य सुना

** सुन्दर सजी किन्तु अश्लील पुस्तक और रूपवती वेश्या **
कभी भी सम्मान के पात्र नहीं बन पाते चाहे लाख जतन करो।

कोई भी देश, प्रदेश, जिला, तहसील, गाँव, और उसमें बसने वाली
जाति, वर्ग, समुदाय, जीव या कोई भी महान जीवित या मृत वस्तु
अपनी मौलिकता के लिये जाना और पहचाना जाता है
जो उसे ईश्वर की अनुपम एक मात्र कृति के रूप में स्थापित करता है।

प्रत्येक जाति की परम्परा, रीति रिवाज, खान पान, रहन सहन,
जीवन दर्शन, मूल्य, आदर्श, नीति, नियम, का नियत स्थान है?
जिसे बदलना संभव ही नहीं है और बदलने का औचित्य श्रेष्ठ?
तर्क के लिये तर्क, रात काली करने के लिये बातें उचित माने?

मूल्यवान से मूल्यवान कोहिनूर हीरा को लें या आक्सीजन
अपने केंद्र में निश्चित इलेक्ट्रान, प्रोटान, और न्युट्रान संग
एक निर्धारित चक्र में, एक नियमबद्ध मौलिक क्रम में स्थित
क्रम, चक्र, उर्जा, स्थान और उसके घटक ही बनाते हैं *हीरा*

आन, बान, शान ही निर्धारित करते हैं जीवन मूल्य?
मूल्यवान वस्तु के साथ मूल्यहीन वस्तु को मिला दें
मूल्यवान वस्तु अपना मूल्य स्वयमेव खो देती है?
माना कि मिला दिये गये तो बंध प्राकृतिक चिर स्थाई?

संश्लेषित कर दिया गया हाइड्रोजन और आक्सीजन?
अब मिलकर दोनों तत्व बन गये जल, स्वाद, रंग, गंधहीन?
विलोपित हो गए गुणधर्म दोनों महान तत्वों के क्षण में?
करो जतन विश्लेषण के जब तुम्हे ज़रूरत तुम्हारी?

माना कि जल ही जीवन है, जल जीवन का आधार है।
बिन पानी सब सून, श्रृष्टि जल मग्न हो गई तब?
जल प्लावन पश्चात् जीव एक कोशीय अमीबा?
करते रहो जीवन पर्यन्त प्रयोग पीढ़ी दर पीढ़ी

अन्वेषण, जीवन लक्षणों की व्याख्या और समीक्षा?

जल प्यास बुझायेगा, संदेह उत्तम विलायक है?
शक्कर, नमक से लेकर जहर तक घोल डालेगा स्वयं में?
लोक कल्याण में कैसी भूमिका सम सामयिक?
अथवा प्रजातांत्रिक अपने ही अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह?

मान लो जल प्रदूषित हो गया जल निर्मल रह पायेगा?
कितनी और कौन कौन सी संक्रामक बिमारियों का
संवहन और संचरण किन स्वस्थ प्रजातियों पर होगा?
तब इस प्रयोग, संश्लेषण, विश्लेषण पर आत्म ग्लानि?

यदि हम ५ रूपया प्रति किलो के टमाटर को छांट सकते हैं?
तो विश्व कल्याण के लिए अनुभूत जीवन दर्शन क्यों नहीं?

जिस समाज, माता, पिता, सगे संबंधियों, हितचिंतकों की
छाया में पले, बढ़े, आश्रय पाया कर दें अनसुनी अपनों की?

हम क्या कर रहे हैं ज़रा दिल पर रखें हाथ करें विचार?

क्रमशः
*ये रिश्तों की कड़ी है
*मेरी सोच का एक पहलू
*अगली कड़ी में रिश्ते
*फिर एक नई सोच
समर्पित युवा पीढ़ी को जो सजातीय और विजातीय
प्रेम विवाह में विश्वास रखते हैं
चित्र गूगल से साभार         

Sunday, 3 March 2013

तेरी यादें


१ *
सींचकर अश्क-खूं तेरा प्यार दिल में पाला है
तेरी मर्ज़ी है पनपने दे या तोड़ दे मेरी खातिर

२ **
तेरी यादें तेरा एहसास कैसे मखमली हैं?
मैंने जाना ये कसकती हैं प्यार के बाद

३***
हवा का रुख बदल जाये ऐसी तासीर अपना लो
के उस तकदीर को पढ़कर खुदा भी मुस्कुरा बैठे

४ ****
मेरी सांसे ये धड़कन मेरा वजूद है फ़क़त तेरी खातिर
तू मुड़कर देख ये आंखें तेरे कदमों के निशां ढूढ़ती हैं

५ *****
सांस रुकती नहीं ये दर्द थमता क्यूं नहीं
यादों ही यादों में बस रात कटती जाती है

०३  मार्च २०१३
समर्पित मेरी * ज़िन्दगी * को
चित्र गूगल से साभार       

Friday, 22 February 2013

तेरा प्यार

१*
ज़िन्दगी की किताब का हर्फ़ बनना ऐसे
फिर बनके ज़िन्दगी में बस जाना यूँ ही
जिसे पढ़ें बड़े जतन से उम्र भर प्यार से
वो खुशनसीब हैं सलाम उनके प्यार को

२**
यूँ इंतज़ार कैसा याद पल पल सता जायेगा
आँखें टिकी हैं तुझपे प्यार कैसा रंग लायेगा?

३***
जूझकर फिर किनारों से क्यूँ लौटता हूँ हर बार?
मैं जानता हूँ तेरा प्यार, तू जानती है मेरा प्यार?

४ ****
जाना मेरी किस्मत में था, जाना ने जाना रोक लिया?
मैं उसी मोड़ को तकता हूँ, तेरी परछाई बन आज भी

५ *****
ख्यालों में अक्सर तन्हा साया होता है
तसव्वुर बन जाये वो हमसाया होता है

22.02.2012
समर्पित मेरी ** ज़िन्दगी **को
जिसके बिना ज़िन्दगी **ज़िन्दगी **कहां

Saturday, 16 February 2013

एक ही पल में

छुप गया सूरज
क्षितिज में आज
नींद और सपने
जीवन की डोर
रूक गये पलकों पर
एक ही पल में

घर की दीवारें
मंदिर के कलश
गिरिजा के क्रास
मस्जिद के गुम्बद
हो गये दफ़न
एक ही पल में

बंद हो गई राहें
टूट गई पगडंडियाँ
तंग पड़ गये आंचल
फ़ैल गये सज़दे में
हिन्दू मुसलमां मेरे
एक ही पल में

ये हादसा क्यों?
एक ही पल में?
और इंतज़ार क्यों?
इन हादसों के लिये
मेरे घर का आँगन ही?
एक ही पल में

16 फ़रवरी 2013
भारत पाकिस्तान सीमा पर और
लीबिया भूकंप में मारे गये * विश्व धरोहर *
बच्चों की याद में समर्पित
यह रचना 27.अक्टूबर 2011 को
एक कमेन्ट सहित प्रकाशित का पुनः प्रकाशन
चित्र गूगल से साभार