गुरुकुल ५

# गुरुकुल ५ # पीथमपुर मेला # पद्म श्री अनुज शर्मा # रेल, सड़क निर्माण विभाग और नगर निगम # गुरुकुल ४ # वक़्त # अलविदा # विक्रम और वेताल १७ # क्षितिज # आप # विक्रम और वेताल १६ # विक्रम और वेताल १५ # यकीन 3 # परेशाँ क्यूँ है? # टहलते दरख़्त # बारिस # जन्म दिन # वोट / पात्रता # मेरा अंदाज़ # श्रद्धा # रिश्ता / मेरी माँ # विक्रम और वेताल 14 # विनम्र आग्रह २ # तेरे निशां # मेरी आवाज / दीपक # वसीयत WILL # छलावा # पुण्यतिथि # जन्मदिन # साया # मैं फ़रिश्ता हूँ? # समापन? # आत्महत्या भाग २ # आत्महत्या भाग 1 # परी / FAIRY QUEEN # विक्रम और वेताल 13 # तेरे बिन # धान के कटोरा / छत्तीसगढ़ CG # जियो तो जानूं # निर्विकार / मौन / निश्छल # ये कैसा रिश्ता है # नक्सली / वनवासी # ठगा सा # तेरी झोली में # फैसला हम पर # राजपथ # जहर / अमृत # याद # भरोसा # सत्यं शिवं सुन्दरं # सारथी / रथी भाग १ # बनूं तो क्या बनूं # कोलाबेरी डी # झूठ /आदर्श # चिराग # अगला जन्म # सादगी # गुरुकुल / गुरु ३ # विक्रम वेताल १२ # गुरुकुल/ गुरु २ # गुरुकुल / गुरु # दीवानगी # विक्रम वेताल ११ # विक्रम वेताल १०/ नमकहराम # आसक्ति infatuation # यकीन २ # राम मर्यादा पुरुषोत्तम # मौलिकता बनाम परिवर्तन २ # मौलिकता बनाम परिवर्तन 1 # तेरी यादें # मेरा विद्यालय और राष्ट्रिय पर्व # तेरा प्यार # एक ही पल में # मौत # ज़िन्दगी # विक्रम वेताल 9 # विक्रम वेताल 8 # विद्यालय 2 # विद्यालय # खेद # अनागत / नव वर्ष # गमक # जीवन # विक्रम वेताल 7 # बंजर # मैं अहंकार # पलायन # ना लिखूं # बेगाना # विक्रम और वेताल 6 # लम्हा-लम्हा # खता # बुलबुले # आदरणीय # बंद # अकलतरा सुदर्शन # विक्रम और वेताल 4 # क्षितिजा # सपने # महत्वाकांक्षा # शमअ-ए-राह # दशा # विक्रम और वेताल 3 # टूट पड़ें # राम-कृष्ण # मेरा भ्रम? # आस्था और विश्वास # विक्रम और वेताल 2 # विक्रम और वेताल # पहेली # नया द्वार # नेह # घनी छांव # फरेब # पर्यावरण # फ़साना # लक्ष्य # प्रतीक्षा # एहसास # स्पर्श # नींद # जन्मना # सबा # विनम्र आग्रह # पंथहीन # क्यों # घर-घर की कहानी # यकीन # हिंसा # दिल # सखी # उस पार # बन जाना # राजमाता कैकेयी # किनारा # शाश्वत # आह्वान # टूटती कडि़यां # बोलती बंद # मां # भेड़िया # तुम बदल गई ? # कल और आज # छत्तीसगढ़ के परंपरागत आभूषण # पल # कालजयी # नोनी

Thursday, 18 July 2024

***** अनाम दाई *****



बड़ दुख लागिस ......आँखि आंसू म झुंझरागे....
पर साल के आगू साल श्राद्ध  करे गयेन त बड़ नियम, धरम, नेंग चार, बुलऊआ पुरखा मन के नवा नवा बात जाने बर मिलिस ...
श्राद्ध, तरपन, फेर पिंडा दान करे बर लगारी लगाके ....
प्रयागराज ,फेर बनारस, फेर गया जी जाए बर परही .....
त सब्बो जगा पुरखा संग हितु पिरितु मन के पिण्ड दान करे बर परही ,, फेर महाराज कहिंन के सब्बो झन तो इही लोक के माया ले उबरे नई ये ,,,,, हम पूछ पारेंन त इंकर मुक्ति गति कईसे बनहि ।।
व्यास जी कहिंन जावा सब्बो झन ल सादा चाउर धरके नेवता पारके संग म ....धरा .... कहाँ ले ?  जावा मुर्दावली ओमन ल संगे संग धरा मुर्दावाली ले आउ संसार के मोह- माया  ले मुक्ति देहे बर ....फेर ओहि मनके आगू म पिंडदान करके ओमन ल बिदा करा नहीं त भटकत रहीं ओकर जी इहें .....
फेर जब पितर पाख म बलाहा अलग अलग तिथि म त आँहिं तुंहर ओरी छांव म तुंहर रान्धे पसाय जिनिस ल खाये जुड़ाय...

गांव, घर , परिवार, गोत म नेंग चार , धरम, करम आउ ......
लोकाचार , बेवहार एक नहीं सगरी परकार के निभाये बर परथे 
अकेल्ला तो जिनगी चलय नहीं संगी , संफरिहा, संगवारी, कमिया, कमैलीन, बुता करईया, चिरई, चुरगुन, गाय, गोरु, कतका ल गिनावव एकर संग खुद पिंडा परवईया के कुल, गोत, प्रवर, बंश, श्रेनी के महतारी पच्छ आउ ददा पच्छ के सात पीढ़ी तरी ऊपर कहि देवा के उत्ति बुड़ती सबके तरन-तारन होथे ।।
सोज्झे काय गुने म गिनाही खोज पांच पीढ़ी उत्ति ले ....
करमनीया डोलगे सबके ना सकेलत म .....

श्राद्ध करवाइया जजमान Ravindra Sisodia 
जात क्षत्रिय , कुल सिसौदिया, प्रवर .... श्रेणी ......... , कुल देबी ....., कुल देंवता........, अस्त्र........, शस्त्र......., बंश........,
सबके हिसाब किताब संग म ददा ...बबा...आजा... पर आजा... फेर ओकर बाप ....फेर ओकर बाप .....मिलगे आउ मिलिचगे
ए दे ....ए दे फदक गे दाई पच्छ म आके .......
श्राद्ध करवइया जजमान जस के तस बबा Ravindra Sisodia 
माताराम विद्यावती जौजे गो लोक बासी श्री भुवन भूषण सिंह (नक्की बाबू)बड़े भाई भुवन भाष्कर सिंग, ...तेकर बड़े भाई ..सत्रुघ्न सिंह उकील ददा.ओकरो बड़े भाई डॉ चंद्रभान सिंह... तकरो बड़े भाई ....बैरिस्टर ददा छेदीलाल जी......
दाई विद्यावती देवी इंकर सास सोन कुंवर दाई जी  फेर ...इनकर सास, ....अनाम इंकर बूढ़ी सास...आजी सास....पर आजी सास
बस ई ही महतारी मन जुरगें अपन नां संग गांव के नाम जइसे कुंती, माद्री, कौशल्या इहु घला मन उँकर जनम देश, गांव के नाम धरके
हूंत करावँय......भाष्करींन दाई घरवाला के सेतिर आज घला खटोला मालगुजारी के हमर दाई के चिन्हारी हवय ।

गोत्र ह तो मिली जाथे बर बिहाव मरनी हरनी म सुने सुनाय....
 *** अत्री, भारद्वाज, भृगु, गौतम, कश्यप, वशिष्ठ, विश्वामित्र ***
कोंहुँ न कोंहुँ त होबेच करथे .......मिली जाथे...
प्रवर :- जेमा कुल नाम, परम्परा संगे संग गोत्र आउ जिनगी के करम, धरम, नेंग चार , चरित्तर, गुन, दोस, अकार, परकार, रंग जम्मो कोंहुँ बेर अबेर छट्ठी, छेवारी आत जात दिख जाथे ...
कुल :- घलो ल पूछथे ईँ ह बड़ मुश्कुल हो जाथे काय....….?
लहू के मिजान ....मेल आय तो बड़ सहज, सरल, पानी कस आर पार दिखईया फेर नछत्र, गोत्र, संग पूजा पाठ, जे ह फोकटीहा 
लागथे ....बिज्ञान म लपटाय रथे हमर नेरूहा कस .....
कुल के पयडग़री बने रहय तेकर सेतिर पूछ पुछारी करे रथें ...

आके सटक जाथे बुद्धि सब्बो झन के महतारी कुल म....
मोर दाई के नाव कुमारी, ममा दाई तिरजुगी दाई, बूढ़ी ममा दाई पीली दाई अब ओकर आगू  आजी ममा दाई कोनरहींन दाई , पर आजी ममा दाई रिसदिहीन दाई, ओकर दाई फेर होगे नरियरहींन दाई...खोजत रही गयेन ना ...धराये रहिस होही फेर सुरता ....
होंगे हमर दाई मन  ***** अनाम *****
दाई जे ह हमर बंश ल जनम देथे तेकरे नाम ह अनाम हो जाथे
         ***** अनाम दाई *****
जेह ७ भाँवर किदर काय परिस ओकरे होगे जनमा दिस बाबू नोनी
घर के लच्छमी बनके आइस त दुनों कुल ल तार दिस ..…
मरगे देहरी नई डाँहकिस जनम भर  कुल के मरजाद खातिर ....
मनखे ल बाप के पदबी धरा दिस मुड़ी ले अंचरा नई ढ़रकिस
महतारी घर के बाहिर निकरिस नहीं फेर बाहिर म चिन्हारी दिस
अपन कुल, गोत्र, घर दुआर ल जनम भर तियाग के संग धरिस ...
दाई, ददा, भाई, बहिनी सबके मोह माया छोंड़ के आन घर आइस 
सुरुज उईस आउ बुडगे उमर भर मोर डेहरी कस छां बने रहिस
दाई के एक घं छां ह अलोप होईस त कुलुप अंधियार होगे जिनगी .
भले चारों कती बग बग ले सुरुज नारायन के अंजोर हवय .....
गुरु Rahul Kumar Singh  भला तूं ही बतावा तो ईँ ह आय ?
         ***** अनाम दाई *****

बस यूं ही बैठे-ठाले
१७ जुलाई २०२४

आइए स्मरण कर देखें पूर्वजों के नाम अपने नाम संग चढ़ते क्रम में
देखें हमने कितनी पीढ़ियों को सहेज रखा है मानस पटल पर
भूले से भी स्मरण करने का प्रयास न करें मातृ पक्ष की पीढ़ियों को 
पीड़ा होगी शायद हो जाये आत्मग्लानि कि हम कैसे भूल गए चार पीढ़ी ऊपर के हमारे कुल रक्षक जननियों के नाम को .....
बस स्मरण रहे उनके जन्मस्थान जिसने उन्हें नाम दिया ।।
    " अनाम दाई अकलतरहींन ,,

Thursday, 13 June 2024

***** चाण्डाल ( रमाकांत )

एक कथा सदियों पुरानी
एक नगर में यशश्वी राजा मार्तण्ड रानी मीनाक्षी देवी संग
इनकी कीर्ति चारों दिशाओं में चंदन सी महक रही थी
सुदूर घने जंगल मे एक तपस्वी अपनी तपस्या में मगन
पशु, पक्षी, जानवर निःशंक एक संग जीवन यापन में

एक दिन राजा बन की शोभा देखने निकले और भटक गये
घने जंगल में दूर आग जलती दिखी, आश्रय हेतु निकल पड़े
राजा मुनि आश्रम के सुचिता में पूरा श्रम थकान भूल गए
आश्रम में भार्गव मुनि के अतिरिक्त कोई न था 
किन्तु जरूरत की सभी वस्तुओं से आश्रम परिपूर्ण था
रात्रि विश्राम और मुनि के आतिथ्य सत्कार से अभिभूत हो उन्हें नगर आमंत्रित किया और सेवा का अवसर मांगा

कालांतर में भार्गव मुनि काल की प्रेरणा से नगर पहुंचे
राजा और रानी देव् तुल्य मुनि को पाकर अति प्रसन्न हुए
उन्होंने मुनि की रुचि और प्रतिष्ठा अनुरूप स्वागत किया
राजा ने रानी  को शयन कक्ष मुनि को देने आग्रह किया
रानी मीनाक्षी ने शयन कक्ष सुसज्जित कर सौंप दिया

शयन कक्ष में दीवाल पर एक संगमरमर में राजहंस बना था
उसके सामने खूंटी पर नित्य नियम रानी मीनाक्षी
अपने पिता की अंतिम दी गई निशानी मोतियों की माला
बड़े जतन से टांग दिया करती और प्रातः पुनः धारण करती

संजोग जो था रानी मीनाक्षी की उस दिन वो माला वहीं रह गई
भार्गव मुनि समय से आराम करने लगे किन्तु अर्धरात्रि को
अचानक निद्रा टूटी और देखते हैं कि राजहंस सशरीर
धीरे-धीरे एक एक मोटी के मनके को निगल रहा है

मुनि स्तब्ध रह गए अरे ऐसा क्यूं कर ,, क्या यह संभव?
मुनि ने मन मे विचार किया शायद यह मेरा भ्रम होगा
शायद थकान या राजाश्रय में चित्त का विकार होगा
चित्र सजीव हो और ऐसा कृत्य कदापि सम्भव नहीं !

ऐन केन प्रकारेण रात बीती, प्रातः वंदन कर राजा से विदा मांगी, राजा ने आग्रह किया एक दिन और रुकें .....
किन्तु काल ने कुछ और ही लिख रखा था ,, 
मुनि रवाना होने को उद्यत हुए और रनिवास से खबर आई

शयन कक्ष में टँगी मोतियों की माला खूंटी पर नहीं है!!!!

रानी मीनाक्षी के पिता की अंतिम निशानी रनिवास से गुम
मुनि स्तब्ध हो गए ,,,, उन्होंने राजन से रात की बात कही
राजन कल रात राजहंस मोतियों की माला निगल रहा था
कौन करता विश्वास,,,, चित्र कभी सजीव होगा .....
राजा किंकर्तव्यविमूढ़... मुनि को अंगरक्षक बन्दी कर गए

पूरा राज्य इसी चिंता में आकुल रहा कि आखिर मुनि...
सब सोचने लगे राज्य के सन्यासी का ऐसा आचरण

इसी उहापोह में दिन बीत गया राजा मार्तण्ड चिंता मग्न
रात कटे न कटे अचानक शयन कक्ष में एक आहट हुई
राजा की आंखे खुली उन्होंने एक अनोखी बात देखी
राजहंस धीरे-धीरे मोतियों की माला उगल रहा था .....

राजा मार्तण्ड सोचने लगे मन का वहम होगा ,,, 
किन्तु भोर में जैसे ही आंखे खुली ...खूंटी पर माला

राजा का मन पश्चाताप से भर गया,
सिर झुकाये मुनि के समक्ष पूरे वृत्तांत संग क्षमायाचना

भार्गव मुनि ने कहा ......राजन ! ...ये होनी थी जो घटी 
कल प्रातः से रात तक मैने भी समाधि ले चिंतन किया
आखिर इस प्रकार ये होनी कैसे घटित हुई , 

तब ज्ञात हुआ .....प्रारब्ध

मैने आपके ही समान 50 वर्ष पूर्व जनकपुर में
रामाधीन का आतिथ्य स्वीकार कर अन्न ग्रहण किया था

राजन ने प्रश्न किया
मुनिवर आतिथ्य और अन्न का इस घटना से क्या संबंध है?

मुनि ने कहा होता है राजन! 
आप मानो न मानो 

तभी तो राजहंस का चित्र रानी मीनाक्षी की माला निगल गया 
जाने अनजाने पाप और पुण्य के फल भी भुगतने होते हैं

राजन मैने रामाधीन के बरछा खेत का अन्न खाया था ।
बरछा खेत के निकट एक अशांत श्मशान है
जहां बरसों पहले चाण्डाल ( रमाकांत) को जलाया गया था
इस चांडाल ने अपनी मां , पिता , भाई  बहन सबको कष्ट दिया
उन्हें इस कदर अन्न के एक एक दाने के लिए तरसाया,
अन्तोगत्वा वे सब भूखे प्यासे समय पूर्व मर गए।।

लोग मुरदे की राख नदी में बहाना भूल गये थे ।

एक सांड क्रोधित होकर उसे खुरों से खुरच रहा था 
अपना क्रोध चांडाल के जले स्थान पर उतार रहा था ।।
उसकी राख उड़कर उस खेत तक गई, जहां अन्न उपजा
अन्न कर के रूप में राजकोष में 
राज्य को संताप और राजा को आत्मग्लानि
रानी मीनाक्षी का मन क्लांत होना ,विधान में लिखा था 
और दोष मेरे भाग्य में लिख गया ।।

राजन स्मरण रखें 
दोष जाना अनजाना सब हमारे भाग और भाग्य का होता है ।

13 जून 2020 रात्रि 3.31

Saturday, 30 March 2024

***** भितरहीन आउ खवईया *****

बड़ महात्तम आय खवईया के जे मानिस ते जानिस

आज होरी म गुलाल लगिस गाल आउ कपार म ..…
आउ रंग ह उबकगे अन्तस् ले छाती म ..आँखि के कोर ह चुचुवागे
दु महीना पहिली ले बनत रहिस फांदा ...देला बलाबो ...देला घलो
सब सियान के सुरता करेन , कईसे मया करै बबा हमर...
लईका ल तो बबा ह बिगारथे... नाती कुछु गलती करबेच नई करय
कभू बद्दी देहे चल देहे त तोर सात पुरखा तरगे ...
भोलेनाथ ल बिनोबे आज ले कभू नई जावव कोकरो घर बद्दी देहे 
लईकाई म पागे कोकरो सइकिल त ..खेचेक खेचेक डंडी के भीतरी ले हाफ पईडिल म गोड़बोजवा चलिस गाड़ी, फ्रीभील ह छोंड़ देवय
नाँहीं त सटकगे त दुनो पार रेंगे धर लिस सइकिल ...होगे बुता

पहिली कहाँ खाई खजेना .... हटरी म गुलगुल भजिया, बरा, मुर्रा के लाड़ू, करी के लाड़ू, चना फुटेना, आउ मेला म जिलेबी, आलू के  गुलाब जामुन, चना चरपटी बस होगे लइकईँ के खंजा...
फेर कभू कभार कोंहुँ मर हरगे पर गे छुट्टी त ....
इंदिरा उदीयान के चार, मकोईया गड़ेन दे कांटा हाथ गोड़ म फेर..
अमरताल भांठा के बोइर, बनाहील, खटोला, के गंगा अमली,
आउ गिरगे पानी त पूरेनहा, दोखही, पर्रि, रामसागर , लख्खी के धार म चढ़त मछरी ....बाम्हन घला केंवट के सेतिर घर दिस ...
फुर फुंदी उड़ातहे अध्धर ले धरे जानिस तेकर निशाना उच्चे...
केकरा, बिछी के डाढ़ा म डोरी बांध डारिस ते बड़े दाजुगर आय...

जेहर ए डारि ले ओ डारी बेंदरा कस कूद दिस ते ह हमर जोंडी...
ठूठी बीड़ी बबा के कलेचुप धर लाइस आउ संग म दु ठन सईघो बीड़ी संग माचिस के कांडी आउ माचिस फोफि के पट्टी ...
ओकरे कहे म चुरय अमली पेंड़ के निकरे कौआ अंडवा....
बारा बतर के रहय लइकाईँ के फांदा...
हपट गयेन कभू त माड़ी कोहनी छोलागे त संगी मुत दिस...
आज तो सगे बियाये लईका कटाय म नई मुतय .ओरजन घट जाहि 
नाक फुटगे नून पाल , डंडा पचरंगा, ईभ्भा खेलत म त सूंघ ले गोबर आज कोंहुँ ल सुंघों दे त सीधा परलोक धर लेहि ।

कोंहुँ ले बुलके आइस लईका *खवईया* के पहिली दिख जावय
खवईया***** मुखिया मुख सो चाहिए, खान - पान सो एक ।
                     पालय पोषय सकल अंग, तुलसी सहित विवेक ।।
जेकर अन्न पाये के बाद आन के थारी लगय ....
आज घलो मरनी-हरनी, बर-बिहाव के पूजा-पाठ म हवय सियान
ओहि ल ओकरे बर भितरहीन हेरही पहिली थारी...
जुन्ना दिन म पोतिया पहिर के रांधय दार भात ...
बटलोही म चुरय दार, त कुंड़ेरा म दूध , करिया हंडिया म भात
खसखस लोहाटी करईहा म चुरय साग ...त कोन बीमार परय ?
आजो कथें हमर दुआरी ओसारी म ....
महतारी के परसे आउ मघा के बरसे ... बिस्तुर नई जावय ...
आज काल बदलगे भितरहीन ...रान्धथे बिन मया दया के
कोई नेंग चार नई ये कांही श्रद्धा नई ए ...
फुस ले करिस चूर गे, फोस ले करिस उतरगे...
ओलिया दिस फिरिज़ म खा जुड़ाये ल ...पर बेमार...
पहिली तात तात भात, निकरत हे धुआं महकत हे साग
दूध, दही, गुर, घी, अथान, चटनी, बरी, बिजौरी, 
मढ़ाये हवय पठेरा म कौंरा सिराये नई पाइस परोसा होगे ।।

बबा Ravindra Sisodia कहत रहिस नंदागे सब ....
आउ आगू नई सुरता राखहिं काय, 
अलोप हो जाहि बाती कस लव सबो नियम धरम आउ मया...

बस यूं ही बैठे - ठाले
होली की शाम सबको सादर प्रणाम

" अगास दिया ,,

चूल्हा के आगी आय मोर महतारी 
कभू-कभू लागथे भौरी मारत पानी के लहरा आय दाई
फेर कोहुँ दिन ओकर छाती ह भुंइया कस पसर जावय
ददा बताइस तोर महतारी पवन आय बगर जाथे सब जगा
दीदी कहिस हमर महतारी अगास आय

दाई लइकई म चित्त सुत जावय आउ गोड़ म फ़ांस लय गोड़
ऐढ़ा-बेढ़ा फंसगे हमर गोड़, आउ अध्धर होगे चुतर
डेरी हाथ जेवनी म आउ जेवनी हाथ डेरी म धरागे

फेर कभू-कभू माताराम बईठ जाय खटिया के पाटी म
आउ फ़ांस देवय दुनों अपन गोड़ के आजू-बाजू
एहु म फेर हेल्ला  पर जाय हमर दुनों के चुतर
हवा खुल जावय पेट हरू हो जावय, गोड़ के गुझियांये 
सकलाय जतका नस रहय ते मन पट पट ले माढ़ जाय
ई खेल आउ खेलवारी म रहीस हमर बैज्ञानिकता
ओइ गीत मोर महतारी के आजो घलो किंदरत हे मन म

***** झुलिया झूल कदम के फूल
बाहरत-बाहरत कौड़ी पायेन ।।
          एहि कौड़ी के नुने बिसाएंन
ओहि  नुने ल गईया खवाएंन ।।
           इहि गईया ल गयेन चरायेंन
ओहि गईंया ल गयेन धनायेंन ।।
            इहि गईया के दुधे दुहायेंन
ओहि दूध के खीर पकायेंन ।।
           आ जा राजा मुहूं ल खोल
ए दे खीर  गुप्पूक ले ।।

माताराम गुड़ेरिया चिरई कस फुर्र ले उड़ियागे
सोचत हावव अगास म कोन मेर होही
अगास म देखथौं चोर आउ खटिया (सप्तर्षि) के दुरिहा म
***अगास दिया *** बन रब्बक ले चमकत मोर महतारी 
गीत सुनावत हे मोर बहिनी सुनीता ल

***अटकन बटकन दही चटाकन
लऊहा लाटा बनके कांटा
    तुहूर तुहूर पानी आवय
सावन म करेला फुटय
     चारों ( पांचों ) बेटी गंगा गईँन
गंगा ले गोदावरी
     पक्का पक्का आमा खाईन
आमा के डारा टूटगे
        भरे कटोरा फुटगे

काबर भरे कटोरा फुटगे ?
कईसे भरे कटोरा फुटगे ??

आश्विन कृष्णपक्ष तृतीया, पितृ पक्ष
12 सितम्बर 2022

ये कहानी समर्पित माताओं कोमोर महतारी ..… बड़ सुग्घर

कारी आउ गोंदील (दाई-बेटा ) दुनों झन शिवरीनारायण मेला देखे गईन । सरकस, सिनेमा, बरतन दुकान, रेहटा,
जलेबी, चना चरपटी, सड़इल, बताशा, साइकिल दुकान, मौत कुंआ, जोक्कर,कठपुतरी बुलत-बुलत थकगे दाई बेटा । बाढ़त गइस मनसे दूरगँछि कस । रेलम-पेल मंदिर म ठेलागे मनसे ऊपर मनसे छूट गईस सांथ दाई बेटा के हाथ लक्ष्मीनारायण महाराज के गोड़ पखारे के चक्कर म ।।
भगवान के दर्शन के लालसा म भुलागे महतारी बेटा ल ।
बाह रे माया तोर मालिक महतारी कल्लागे अपन दुच्छा हाथ देखके ।। छूटगे कारी के तोलगी लइका के हाथ ले 

पहिली पइंत छुटिस अंचरा दाई के अध्धर होंगे लइका
कोरा सुन्ना लागिस कारी ल, मन भुकुर भुकुर होंगे ।
गोंदील हदरगे अकेल्ला होके, चारों मुड़ा अंधियार होगे ।
दाई ओ दाई ओ दाई.........चारों कोती मातगे पीरा...
फेर मेला के हल्ला गुल्ला आउ धक्का पेल बड़े परगे 
गोंदील के रोवइ कल्लाई के ऊपर ,,,, देख डारिस पुजारी
लइका के आँखी के आंसू आउ मन के पीरा ...…. ।

पुजारी हपके बलाइस मेला के कारकुन ल ... करवादिस
हांका । बाजगे भोंपू । लइका गँवागे मंदिर म पुजारी करा हवय देखा भाई बहिनी मन आवा ले जावा । ऐति बिपतियागे चार मनसे लइका संग ,,,  तोर काय नाम आय
गोंदील, कोन गांव म रथस ...नई जानव, काकर संग आय हस.... दाई संग , काय नाम आय ...कारी, कइसनहा दिखथे .... मोर दाई बड़ सुग्घर हे । मोर महतारी बड़ सुग्घर ..हांका घनघनागे सुना हो बहिनी मन सुना जी...

जुरगे मेला म महतारी ...सोन चांदी म लदाय , किसिम किसिम के लुगरा , हांका परतगे महतारी जुरतगे ...
मौका मिलगे बहिनी दाई मन ल बताय के ...देख मोर 
सोन के पुतरी, कलदार, सूंता, कटवा, मरीच दाना, गल पटिया, गुलु बन्द, हाथ के हर्रेया, गुजरी, ककनी, कड़ा, कंगन, नांग मोरी, आउ हालगे बनुरिया, गोड के लच्छा , पायजेब, तोड़ा, पैरी, झांझ, सांटी, गुलशन पट्टी बाजगे गोड म, एक से एक  बहुरिया कुढ़ परगे, रद्दा मूंदागे...
आँखी थिरके धरिस भगवान के रचना देखके........।
कस बाबू एमा कोन ह आय तोर महतारी...…..?
अपन ले अपन सुग्घर माई लोग ...फेर नई फरक परिस 
गोंदील ल । अधीर होगे । दाई मोर आँखी म नई दिखिस ... धुँधरागे आँखी मनसे के फुदका उड़ाई म ।

थकगे सुरुज घला  बुड़ती म चले बर धर लिस पच्छिम म
मनसे मन घलो धीरे-धीरे छटागे ,,, रोवाई घला थिरागे
फेर छाती के सुसकाई जस के तस बने रहीस .....
दिन बुड़ती होगे, बरदी लहुटे बर धर लिस , गरुआ के खुरी के धुर्रा बगर के माघी मेला म , इहि ओहरती बेरा म
लक्ष्मीनारायण मंदिर के कलश ले लहुटती सुरुज के अंजोर परिस कारी के मुंह म गोंदील के आँखी चमकगे

कलपत अल्लर परे कारी गोंदील ल पाके अब्बक होगे
न रोवत बनिस न बनिस सुसकत ,,,, भरगे आंसू
फुदका म सनाय चुन्दी, उघरा मुंड, फाटे रेशम कोर के लुगरा, हाथ म पटा, बीरबीट कारी ,,,, जइसे नाव तइसे मुंह
गोंदील दऊंडगे महतारी बर हपट्त परत ....कूद परिस 
पुजारी अकबका गईस वाह रे मोर सुग्घर कारी
बाह लक्ष्मीनारायण महाराज तोर महतारी के सुग्घराई
धन हस मालिक , धन हे तोर रचना महतारी के

बाह रे गोंदील आउ तोर सबले सुग्घर महतारी कारी
हदरगे दाई हदरगे बेटा महानदी के निर्मल पानी म 
पुन्नी के चंदा घलो सुरता करथे हर साल
कारी आउ गोंदील के किस्सा 

बस यूं ही बैठे-ठाले
माताराम की याद में Ashok Tiwari भाई साहब

Friday, 22 March 2024

# विनिमय #

1976 में विभिन्न जिलों और BTI से स्थानांतरण हुआ
इस कुचक्र में बिलासपुर संभाग भी प्रभावित हुआ ।
मेरे सहित लगभग 600 प्रशिक्षार्थी शिक्षक बस्तर आये ।
दंतेवाड़ा आदर्श बहुउद्देश्यीय विद्यालय में सीखने का अवसर मिला, बेहतरीन छात्रों और आदर्श गुणी शिक्षकों के सानिध्य ने हमें भी लायक बना दिया ।

पठन-पाठन, अध्ययन-अध्यापन पश्चात क्षुधा पूर्ति हेतु बाजार जाते थे वहां मधुकर पांडेय जी से मुलाकात हुई ।।
उनके पास मात्र दो जिनिस मिलते थे ....
नम्बर एक में माखुर और नम्बर दो में मिरचा...
सामने तखरी लगी होती थी बिक्रेता के सामान के मापी के लिए जिसमें वो अपनी वस्तुएं तौल जाते थे ।
यदा कदा अनहेजरा ( लगभग ) डाल दिया करते थे , बगल में बिछे बोरी पर और उन्हें मधुकर जी तम्बाखू या मिरचा दे देते थे, यदा-कदा कुछ रकम भी .....

***** हमने कभी किसी ग्राहक से उनका झगड़ा कभी न सुना न देखा .... जबकि वो अपना सभी सामान कभी तौलकर नहीं देते थे, हाथ में पकड़ा चोंगा में डाला लपेटा और ग्राहक बिना हिल हुज्जत किये धर लिया ।
विनिमय होता था हमने अनमोल और ईश्वरीय विनिमय देखा, कम कभी हुआ ही नहीं, ईश्वर की कृपा रही होगी मधुकर पर कि 2 किलो, चार किलो कि एक पाव में कभी अंतर नहीं आया ,,, 
जिसने जो सामान दिया उसके बदले उसे मिला ।
चिरौंजी, गुल्ली, महुआ, बैचांदी कुछ और वनोपज रहे
तखरी ईश्वर की भरोसा आपस का अनमोल*** विनिमय

मेरे छत्तीसगढ़ की विवाह परम्परा में भी **** विनिमय
जिस घर में बेटी ब्याही गई ........
उसी घर से बदले में बेटी मांग ली गई बहु के रूप में
सबकी अपनी दृढ़ मान्यता जिसका सम्मान किया जाता है
कोई इसे अशुद्ध लेन देन कहे ...उनका स्वागत ...
मेरी समझ में यह विनिमय अति दृढ़ और सम्मानजनक
जहाँ रिश्तों की बुनावट जुलाहा पक्षी (बया) के घोंसले जैसा.... धूप छाँव, बरसात पानी,अंधड़ सभी समान
इतना खूबसूरत ताना बाना कि हवा का कोई झोंका नहीं
बड़े से बड़ा तूफान भी इसे कभी डाल से अलग नहीं कर पाया हमने देखा है बरसों बरस इसकी नियति ...
विनिमय बराबरी की है कभी तखरी अंसतुलित नहीं होता
न नियत डोलता न कभी सामंजस्य की कमी देखी 
सुख-दुख समभाव में कट जाता है 
इस विनिमय में भी छेद नहीं छेदा देखने को मिला 
किंतु सनेही स्वजन बेहतरीन तुरपाई कर देते हैं ।
बीते समय की एक नहीं अनेकानेक घटनाएं है।

बदलते परिवेश में सभी आदर्श , परम्परा, रीति रिवाज, नए स्वरूप में हैं सबका स्वागत ।

बस यूं ही बैठे-ठाले
16 मार्च 2024
एक पुरानी लाइन याद आ गई

मैं रिश्तों को जीता हूँ  ,,,, मैं रिश्तों में जीता हूँ।
मैं रिसतों में जीता हूँ ..... मैं रिसतों को जीता हूँ ।।

रिश्ते झेल नहीं पाओगे तो सांसों का थम जाना स्वाभाविक है ।
सांसें चाहे अपने स्वजन की थमें या हमारी थम जाएं ।

जीवन में चारों पुरुषार्थों में प्रथम पुरुषार्थ का सदैव सम्मान करें ।
आप यदि मोक्ष चाहते हैं तो,  अन्यथा हमारी हैसियत बिना अर्थ के 
उन लोगों के सामने जो हमारे ही अधीन हमारे ही हाथों में होते हैं , गली के खसुआये कुत्ते की तरह होती है, 
एक उम्र के बाद अपनी जगह बनाने के लिए दृढ़ता पूर्वक निर्णय लें
बीती बातें, हैसियत, लेन देन सम्बन्ध आएंगे आड़े.... !
थोड़ा भूलें थोड़ा आड़ लें और कर जाएं थोड़ी मनमानी
कर लें थोड़ी सी धूर्तता......
अन्यथा आप बैठे रह जाएंगे खरताल बजाते और साथ के लोग
आपको  बहैसियत बामुलाहिजा बैकुफ घोषित कर देंगे ।

कौन क्या सोचता है थोड़ा भूलना सीखिए...
आप राम बनें या कृष्ण या बन जाएं बुद्ध संग मीरा....
मैं आपको आलोचना से पाट दूंगा, 
जबकि मैं हूँ ही आपसे...

नियति के पार कुछ भी नहीं 
यदि आपको लगे कि उचित है तो अपने स्वजन की चलती सांसों की डोर को काटने में न हिचकें

न हम..... कर्ता हैं .....न कारण 

निर्णय न ले सकें अपने पुत्र के हाथों को जीवन रक्षार्थ कटवाना तो
हाथ न बढ़ाये उसके पालन पोषण में ...न ही उसके संवर्द्धन में
जरूरी नहीं आपका निर्णय युगों तक याद रखा जाए
किंतु मनमानी तो कदापि नहीं, चाहे आपकी या स्वजन की ...

बस यूं ही बैठे-ठाले
18 मार्च 2024
@#% ...बहदा...@#%

परबत ले उतरत बिन लगाम के पानी के धार गंगा कस....
टोरत, फोरत , एईठत, रमजत, कूदत, फांदत, अपन मऊज म...
उतरथे ऊपर ले तरी त बोहाके ले जाथे ...संग म सब्बो जिनिस ल 
नई देखय नवा, रद्दा, नवा डहर, ओई ह बनाथे नवा रद्दा...
ओकर बेग ल अपने ह  नई थामे सकिस ओई ह गंगा आय
बहदा .....जेकर बेग ओकरे मन ले आर पार रेंग देथे

भागवत कथा,बेद, पुरान म सुनेन राजा सगर के नाती भगीरथ ह एक गोड़ म ठाड़ होके करिस जप तप त आइस गंगा ह....
गंगा कहिस जा तोर तप ह मन ल मोह डारिस ... जा...
भगीरथ मैं आँहा तोर पुरखा मन के तरन-तारन बर ...
फेर देख ले मोर बेग ल कोनो नई थामहे सकिस त...
झन कहिबे ए दे सब्बो ल बोहवाके ले गईस...देख ले ...
सुन ले...गुन ले... 
भगीरथ करिस बिनती आशुतोष महाराज के ....
अवघड़ दानी महादेव जी जटा ल छरिया दिस फेर बाँधिस त घूमर घूमर रहिगे गंगा जटा म कई बछर... सब गरब सटक गे...
बड़ मान मनव्वल म... बड़ केलऊली म ... लटपट ..लट ल छोरिस
पाइस थोकन मुँहड़ा पुरके बर ...मगन होगे गंगा
गंगा पाईस रद्दा मांगे म त फेर निकलिस त घलो टोरत फोरत...
 जे नरवा, झोरकी, नदिया जा मिलिस ओकर म बनगे गंगा ....

*** बहदा ***  एक ठन तिरिया के सुभाव आय ?

जे ह बोहाथे गंगा कस  उफनत, रेलत, सकेलत, पानी संग कचरा, कूटा, गाजा, मईल, पथरा, माटी, बन, कुसा, सबके संग धरे...
फेर थिरावत बनारस आउ प्रयाग म करत तरपन प्रानी के...

जेकर भाग परिस नहा डारिस ....बुड़ बुड़ के
आउ जेकर भाग ले छुटिस ते ओई म सेरागे

फेर तिरिया बनगे कभू बंजर बहदा त ???
निघिरघिन्न हो जाथे काय देखे सोंचे घलाऊ म किसकिस
नई सुहावय संग म रेंगाई ह कोन उतरही ओमा फदके बर
अपने कस बना देथे ...
बड़ किस किस गारी आय महतारी बर ?

सुरता आथे कवि के बानी...
प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो
एक नदिया एक नार कहावत, मैलोहि नीर भरो
जब मिलके दोउ एक बरन भये सुरसरि नाम परो
प्रभु मोरे ......

फेर कभू
बस यूं ही बैठे-ठाले
19 मार्च 2024
बहुत मुश्किल है वक़्त को हाथों में थाम लेना
फिसल जाता है रेत की मानिंद हाथों से
फिसलते चले जातें हैं इस दरम्यान रिश्ते
और हम बेबस खुली आँखों से देखते रहते हैं

कुछ न कर पाना ....कितना आकुल कर देता है?
युग द्वापर हो वा त्रेता या कलयुग ....

बस यूं ही बैठे-ठाले
22 मार्च 2024

Tuesday, 27 February 2024

***** लुवाठ *****


" ऐसी बानी बोलिये मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे आपहु शीतल होय ,,

कबीर के ई दोहा ह छत्तीसगढ़ी बर कहे हे कस लागथे
भले ही हमन कही देथन कि
कोस कोस म बानी बदलय, चार कोस म पानी ।।
फेर नता-गोता के मुं ले निकरिस गोठ आउ झरगे अमरित

ए देखा हमर नता संग हमर कहा सुनी ....
फेर मन म गुन देखा एकर मिठास आउ गरूआपन

१ लूवाठ निपोर काय करत हस ?
गांव म एके उमर के नोनी ह एक झन दूसर करा पूछिस
२ काय लुवाठ लाये हस ग
बड़का दाई ह नाती ल कहिस चेराये रमकेरिया ल बजार ले
धर लाइस त 
३ काय लूवाठ कर डारबो  ई रदबद रदबद पानी म
मोटियारी टूरि ह अपन मया करईया टुरा ल कहत हे 
४ लुवाठ लाबे कुछु मिलहि त न 
बेटा कुपेचहा बेर म समान लाये जाहि त महतारी के गोठ
५ काय लूवाठ बलाबे ओ मन ल
बर बिहाव म नता रिस्ता ल नेंवता देहे बेर म महतारी आउ काकी फूफू के सियानी
६ फेर लूवाठ आय दाई अईसनहा पहुना हर 
घर म माथा पीरा असकट करईया पहुना पहि बर 
७ काय लूवाठ ले जाबोन सोझे आय जाय बर तो हवय
लकठा के गांव घर जिंहा गईस आउ आइस तत्का बेर

एहि किसिम के कई गोठ बात सुने बर घेरी बेरी मिलथे
मोर छत्तीसगढ़ी आउ छत्तीसगढ़ के माटी म सावन के जइसे फुसफुसाथे पानी गमक जाथे गली खोर
बस इही बतर म निकरिस गोठ आउ मन हदर जाथे 
परदेश घलो म लक्कर लऊहा छत्तीसगढ़ ल छुए बर
मोर छत्तीसगढ़ बोली कहव के भाखा गुर कस बड़ गुरतुर 
कोन काकर करा, कईसनहा ,कोन मेर, कतका बेर, काकर बर, कतका कन तान खींच के कहिस .....
बस मिठागे अमरित ले ओपार गुत्तुर.....
आउ दतकी कन होगे तरक-फरक बिख जहर होंगे
आउ भरभरागे ठाड़ धन मिरची कस कई पीढ़ी ले
कस गोई ....के कहई आउ सुनई मंदरस ले जादा मिठ

बबा Ravindra Sisodia  के बच्ची होंगे कैरम खेलत म हमन बड़ खुश हो गयेन अब कईसे खेल सिराही ....फेर मारिस तुकके रानी ल बोजागे गुच्चू म, ओकर संगी घला ल पिलो दिस, रहपट कस परिस ठाड़ खड़े करिया गोंटि अंधमधात गईस गुच्चू म फेर सारे गुच्चू ह उछर दिस
त बबा कहिस दुनो अंठा ल तनेर के "अब धर लुवाठ ल ,,

काय लूवाठ लिखे, तहिं लुवाठ गुन आउ सुन
हमर कुछु लुवाठ मगज म नई खुसरिस

( मोर महतारी के छां छोटे बहिनी सरिता बईठे हे अपन संगी ऋषि संग गोठे गोठ म बात उसलगे त लिख-पोंछ देखें )

13 जनवरी 2024 दिन मंगलवार