गुरुकुल ५

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Sunday, 15 January 2012

ककून

अपने ही बुने ककून में
बनने लगी समाधि
पूरी बनती कैसे
रही अधूरी आधी


ज़ख्म अपनों के दिये
गैर हाथों सी दिये
जो जहां जैसा भी था
हाथ धरकर हाथ पर




यूं कारवां बनता गया
और सब गाफि़ल हुए
शोर सन्नाटों के डर से
हम भी शामिल हो गए

रमाकांत सिंह 17/06/1995





आदरणीया अमृता तन्मय जी
अमृतातन्मय डाट ब्लाग स्पाट डाट काम
के अंगूठा को भेंट

Saturday, 14 January 2012

टूटकर फिर बिखरता हूं मैं


क्यों गुजरता हूं उस रहगुजर से?
जहां खुशियां मिलें न मिले
चाहे गम की कली ही खिले
कोई रोता कभी न हंसे
सदा हंसते रूलाते मिलें,

सर झुकाए गुजरता हूं मैं
जहां परिचित मिलें न मिलें
अपना अजनबी सा लगे
बदनसीबी मेरे ही लिए
सदा आंसू बहाते मिले,

टूटकर फिर बिखरता हूं मैं
जहां भोर मिलकर ना मिले
नित निशा का दिया ही जले
जिन्दगी मौत सा फिर लगे
जिन्दगी-जिन्दगी ना रहे,

रमाकान्त सिंह 20/05/1978
चित्र गूगल से साभार

Friday, 13 January 2012

हम बने नहीं


सागर सा यदि हम बने नहीं
फिर बादल बन क्यों बरस गये
सूरज को यदि हम छू न सके
कब किरणें बन हम बिखर गये

विस्तार गगन का पा न सके
क्यों चक्रवात बन घुमड़ गये
हिमगिरी सा यदि हम बन न सके
बन चंदन कैसे महक गये

जगती सा पावन बन न सके
ज्वाला बन कैसे दहक गये
बन प्राण दीन में रमे नहीं
कैसे परमात्मा कहलायें

मोती माणिक हम बने नहीं
कैसे जग आभा बिखरायें

रमाकांत सिंह 17/09/2010
मेरी मानस पुत्री श्री मति आभा सिंह
के जन्म दिन 20 अक्टूबर पर समर्पित 

Tuesday, 10 January 2012

सापेक्ष


सूर्य की भांति स्थिर
अन्य पिण्डों के सापेक्ष,
परिवर्तनशील स्थिरता भी?
परिवर्तन प्रकृति का मूल
फिर यह भ्रम क्यों?

स्थिर रह गया मैं
अन्य के सापेक्ष,
और बदल गये सब
मेरे सापेक्ष,
सापेक्ष या निरपेक्ष

परिवर्तन या स्थिरता,
हास्यास्पद और करूण
अपनी-अपनी मानसिकता
परिवर्तन को न सह पाने की,
क्योंकि स्थिर रह गया मैं
सबके सापेक्ष,

चल-अचल,
कल, आज और कल
यथावत्
देश, काल,
परिस्थितियां और पात्र

सृष्टि का संतुलन
नियति चक्र में
अपरिवर्तित होते हुए भी
परिवर्तनशील
प्रति पल
अपना प्रतिबिंब लहरों पर

रमाकांत सिंह 4/6/1994
तथागत ब्लाग के सृजन कर्ता श्री राजेश कुमार सिंह
को समर्पित

Monday, 9 January 2012

कर्म संदेश

आओ मेरे संग आओ,
झूमो नाचो गाओ
नियति नटी झूमकर,
यूं धरा चूमकर
गा उठे संग अपने,
मन में सजाये सपने,
आओ मेरे संग आओ

चंद्रमाला सजा,
क्रांति किरणें लिए
नवकला अभिराम से,
भाग्य भास्‍कर के दिये
स्वर्ग है भूतल बना,
कर्म की ले ज्योत्सना
एक नव संकल्प ले,

आओ मेरे संग आओ ...

कर्म संदेश ले,
शांति धारा बहा
कल कथा आलोक से,
रम्य शुचि प्राची सजे
त्यागमय जीवन बना,
धर्म पूरित कामना
शक्ति का आह्वान ले,
आओ मेरे संग आओ

आहुति बलिदान से,
शील सौरभ ज्ञान के
एक नव संकल्प ले,
नवल मुक्ति ज्ञान के,
प्रेम सुधा बरसाओ,
कर्म पथिक बन जाओ,

आओ मेरे संग आओ.

रमाकान्त सिंह 12/01/1980 दंतेवाड़ा
चित्र गूगल से साभार
परम आदरणीय प्राचार्य (स्व.) श्री लक्ष्मीकांत ज्योतिषी जी को समर्पित,
आपने शा उ मा शाला, दंतेवाड़ा में मुझे पुत्रवत् स्नेह देकर मार्गदर्शन दिया।

Sunday, 8 January 2012

रंग बदलते देखा























पुण्य के साये में
पाप उफनते देखा
सूरज को भी पश्चिम से
हमने निकलते देखा,

चांद को भरी दोपहरी
हमने मचलते देखा,
स्नेह के आंचल में
डाह पनपते देखा,

वाह रे दुनियाँ
वक्त के साथ-साथ

अनदेखे रंगों में
गैरों को छोड़ो भला
स्वयं को गिरगिट सा
रंग बदलते देखा

रमाकान्त सिंह
11/03/1977, दंतेवाड़ा
चित्र गूगल से साभार       

Thursday, 5 January 2012

आँखी के पानी


मनसे काबर पथरा ईंटा के होगे?
दुबराज के जगा म काबर बमरी बोंगे?
कहाँ मरगे तोर आँखी के पानी?
कहाँ गवांगे मोर संगी लागमानी?

मंदिर ल छोंड़ दिस पथरा के देंवता
भाई ल भाई कहाँ पारत हे नेंवता,
सड़क म बोहात हे तोर मोर लहू
तैं बों के छोड़े तेला काटिहाँ महूँ,

गाँव के मनसे काबर भागत हे बन म
पुलिस के डर, के पैसा के संगत म?
राहत कार म काबर बांटत हे पैसा?
मनसे हे जस के तस, फेर काकर परोसा?

मरत हे रोज बीच रस्ता म, गाँव के रखवार,
चल हमूं घर ल लेस के, झाँकी आन के दुआर.

रमाकांत सिंह
11 अगस्त 2010
चित्र गूगल से साभार

आतंकियों एवं नक्सलियों की गोलियों से शहीद
जवानों और निरपराध लोगों को समर्पित

शब्दार्थः
मनसे=मनुष्य, काबर=क्यों, पथरा=पत्थर, ईंटा=ईंट, के=का, होगे=हो गया, दुबराज=सुगंधित बारीक चांवल, जगा=स्थान पर, बमरी=बबूल, बों=बुवाई, गे=गया, कहाँ=किस स्थान पर, मरगे=मर गया, तोर=तुम्हारा, आँखी=आँख, पानी=सम्मान, गंवांगे=गुम हो गया, मोर=मेरा, संगी=मित्र, लागमानी=रिश्तेदार, ल=को, छोंड़=छोड़ना, दिस=दिया, देंवता=भगवान, भाई=भाई, पारत=बुलाना, हे=देना, नेंवता=न्योता, बोहात=बह रहा, हे=है, लहू=खून, तैं=तुमने, बोंके=बुवाई करके, छोंड़े=छोड़ दिया, तेला=उसे, काटिहां=काटूंगा, महूं=मैं भी, गांव=ग्राम, भागत=भाग रहा, बन=जंगल, डर=भय, पैसा=रूपया, संगत=साथ रहने से, राहत=भला, कार=काम, बांटत=बांट रहा, मनखे=मनुष्य, जस=ज्यों, तस=त्यों, बस=अंत, परोसा=अतिरिक्त भाग, मरत=मर रहा, बीच=मध्य, रस्ता=राह, रखवार=रखवाला, चल=चलो, लेस=जलाना, झांकी=झांकना, आन=दूसरों, दुआर=दरवाजा.

Sunday, 1 January 2012

मनसे घला


काल करइन के घर म
बिन कपाट परछी के
झर-झर ले आवय
सुर्रा घाम बरसात जाड़,

पानी गिरय त,
गमक जावय रद्दा
ठडि़या जावय रुंवा,
भर मंझनियां

कहां गै घाम, कहां गै बानी,
तरिया के छोंड़, मनसे के पानी
कांप गै तन, फेर नइ भरय मन,
सुनबे त करत हे, सनन-सनन

ए दे देख तो, पथरा ईंटा के घर म
मनसे घला, पथरा ईंटा के होगे।

शब्दार्थ
कपाट=दरवाजा, परछी=बरामदा, झर-झर=एकाएक गिरना,
आवय=आता था, सुर्रा=तेज ठंडी हवा, घाम=धूप, बरसात=वर्षा
जाड़=ठंड, गिरय=गिरने पर, त=तब, गमक=सुगंध, जावय=जाता था,
रद्दा=रास्ता, ठडि़या=खड़ा, जावय=जाता था, रूंवा=बाल, भर=भरी,
मंझनिया=दोपहरी, गै=चला गया, बानी=वाणी/कथन, तरिया=तालाब,
छोंड़=छोडो, पानी=सम्मान, कांप=कांपना, गै=गया, तन=शरीर, फेर=फिर,
नई=नहीं, भरय=संतुष्ट, मन=आत्मा, सुनबे=सुनने पर, करत=करना, हे=है,
सनन-सनन=सन-सन की आवाज, ए=यह, दे=लो, देख=देखना, तो=लो,
पथरा=पत्थर, ईंटा=ईंट, के=का, घर=घर, म=में, होगे=हो गया।

रमाकांत सिंह 10/06/2010
चित्र गूगल से साभार   

भाग्य अपना हम गढ़ेंगे

गढ़ दिया तुमने हमें
भाग्य अपना हम गढ़ेंगे

चलो आओ गढें हम
हमारा भाग्य अपना
हमारा भाग अपना...
हमारा भाग्य अपना

धरा की सहनशीलता ले
जल की शीतल धारा में
अनल की प्रखर ज्वाला से
गगन के खुले माथे पर
हवा के चपल हाथों से
भाग्य अपना हम बुनेंगे
भाग अपना हम चुनेंगे 

वसुधा की हथेली पर
रचेंगे भाग्य अपना
सागर के लहरों पर
लिखेंगे भाग्य अपना
रवि की किरणों से
गढेंगे भाग्य अपना
सितारों की दुनियॅा में
बुनेंगे भाग्य अपना
पवन के कांधों पर
धरेंगे भाग्य अपना

भाग्य अपना हम गढ़ेंगे
भाग अपना हम बनेंगे

रमाकान्त सिंह 20/09/2000
मेरे विद्यालय  के बच्चों को समर्पित 
जिनमें मैं अपना बचपन जीता हूँ  

प्रश्न क्यों अनुत्तरित रह गया?


द्वापर में यक्ष ने प्रश्न किया
युद्धिष्ठिर से
और जी उठे कालक्रम में पाण्डव
श्राप मुक्त हो गया यक्ष,



आज समय ने यक्ष से
प्रश्न किया
वत्स!
एक लबालब दूध से भरे पात्र से
एक लबालब भरे दूध के पात्र को
एक लबालब भरे दूध के पात्र में
रिक्त करें,

किन्तु स्मरण रखें
दूध छलके नहीं
दूध ढलके नहीं,
न आप पीयें
न आप गिरायें
न किसी को दें
न ही ढलकायें,
अन्यथा
परीक्षा का परिणाम
हर युग में एक ही होता है

आज प्रश्न पर
न जाने क्यों?
मौन हो गया यक्ष,

पेड़ की ओट से
एक बालक
प्रश्न को सुन रहा था
मन ही मन
कुछ ताने बुन रहा था

बालक ने झट
यक्ष और समय से
प्रश्न किया
तात!
एक रिक्त पात्र को
एक दूसरे रिक्त पात्र में डुबाकर
एक अन्य रिक्त पात्र को
दूध से भरें

स्मरण रखें नियम
द्वापर की भांति
आज भी जस का तस है
न कहीं कुछ छलके
न कहीं कुछ ढलके
न किसी से लें
न कोई दे
समय और यक्ष
प्रश्न पर बालक के
आज क्यों मौन हैं?
प्रश्न क्यों अनुत्तरित रह गया?

रमाकांत सिंह 12/02/2008 एक यात्रा कथा