गुरुकुल ५

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Saturday, 1 December 2012

ना लिखूं




जब भी लिखती हूँ
बुरा मानते हो?

ना लिखूं तब क्यों
बुरा मानते हो?

जानते हो हाल--दिल
तन्हाइयों में?

ख्वाब-रंज-सुकुं
नसीब होते हैं?

दर्द--दिल
कहाँ जानते हो?

लौटकर फिर साहिल से
फिर साहिल को लौटती हूँ

29.10. 2012
चित्र गूगल से साभार 

20 comments:

  1. बहुत ही कम शब्दों में दिल को छूने वाली रचना !!

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  2. बेहद भावपूर्ण रचना...
    जानते हो हाल-ए-दिल
    तन्हाइयों में?
    ख्वाब-रंज-सुकुं
    नसीब होते हैं?
    गजब है....

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  3. ्सुन्दर ख्याल

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  4. इस चित्र को लगाने का मतलब समझ नहीं पाया। :(

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद बहुत अच्छा लगा आपकी पारखी नज़रों को प्रणाम कभी कभी कहने वाली परदे के पीछे होती है और उसे ताड़नेवाला सामने तब ऐसे ही कुछ वाकया बन जाता है ..

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  5. बहुत सुन्दर....

    सादर
    अनु

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  6. साहिल से लौटकर फिर साहिल पर आना ..ये ही तो प्रेम है ..अबूझ सी पहेली!

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  7. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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  8. चित्र और उस पर चर्चा कविता बनते-बनते रह गई है, या शायद बन गई है.

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  9. चित्र के द्वारा शायद अपनी स्थिति स्पष्ट की है .... द्वन्द्वात्मक भाव ... सुंदर प्रस्तुति

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  10. शब्दों की गहराईयों में तैरना मुझे बहुत अच्छा लगता है
    पर इस बार कुछ सफल कुछ असफल खुद को महसूस कर हूँ
    कविता के भाव बहुत सुन्दर है मार्मिक है ...खैर और रुकुंगी कुछ पल !

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  11. खुबसूरत प्रस्तुति.

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  12. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति.

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  13. जीवन का क्रम है ... साहिल पे लौटना नियति है ...
    बहुत खूब ..

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