गुरुकुल ५

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Tuesday, 13 August 2013

जन्मदिन

जन्मदिन  १३ अगस्त 

HAPPY BIRTH DAY MY DEAR YUWARAJ SINGH 


युवराज सिंह चंदेल 
 मैं आज गर्व करता हूँ युवराज सिंह के गड़रिएपन पर कि उसे यह मालूम नहीं कि सौ का नोट मूल्य में एक रूपये के सिक्के से ज्यादा मूल्यवान है। आज भी वह सौ के नोट पर एक रूपया के सिक्के को भारी समझता है। यही भोलापन उसे राजा भोज के राज्य का चरवाहा बनाता है और मेरा परम शिष्य।

कल तुम क्या बनोगे शायद यह देखने के लिये मैं जीवित न रहूं किन्तु ऐसा महसूस करता हूँ कि शानू को जिन लोगों का आशीर्वाद प्राप्त है उनका सानिध्य उसे इस काबिल बना देगा कि उसमे मैं जी उठूँगा *****

उज्जवल भविष्य की शुभकामना सहित असीम स्नेह ।  

तुम्हारा नाना 
रमाकांत सिंह 
१३ अगस्त २०१३ 

Friday, 19 October 2012

जन्मदिन

जन्मदिन की शुभकामना 20.10.2012

मैंने जन्म ले लिया?
शास्त्रगत या वैज्ञानिक?
निर्धारित कर दिया गया?
जन्मतिथी, जन्मांक, मूलांक

अंकित कर?
काटा गया गर्भनाल?
मुक्त हो गया था मैं गर्भ से?
जन्म के योग से?

कहीं ऐसा तो नहीं?
हमने जन्म ही नहीं लिया
आपने समझ भर लिया
काट दिया गर्भनाल

डिम्बआसन  जुड़ा गर्भ से
गर्भनाल जुड़ा अपरा से
गर्भनाल से जुड़ा शिशु
तब जन्म कैसा?

यदि मैं मृत
तब जन्म?
भाग्य का निर्धारण किस आधार पर?
जब जन्म और मृत्यु एक ही पल में

जन्म शास्त्रसम्मत?
वा लोकसम्मत?
जैसे मृत्यु वैज्ञानिक
या शास्त्रसम्मत

जन्मतिथि का निर्धारण
जन्म समय का निर्धारण
प्राकृतिक जन्म पर?
या अप्राकृतिक कृत्य द्वारा?

जन्मतिथि और समय को ही
बदल डाला कृत्रिम उपादानों से
चिकित्सकीय सलाह पर
ग्रह, नक्षत्र, राशि को मांगकर?

कभी कभी जब घट जाता है
होनी जिसे अक्सर
कह देते हैं अनहोनी
आँख मूंदकर


किस अंक की गणना के आधार पर
ग्रह, नक्षत्र, राशि, कुंडली?
कैसी गणना?
जब आधार ही निराधार


बना दी कुंडली जो बतलाती है?
लिंग लड़का या लड़की
मृत या जीवित
विवाहित या अविवाहित

कालसर्प योग, विवाह
जन्म, मृत्यु
संस्कार, दान, पुण्य
सरल किन्तु सदा जटिल

एक आधारहीन
जन्मदिन, जन्म समय
जन्मांक, मूलांक
प्राण वायु के गणना पर?

20.10.2012
कुंडली की  धारणा सदैव भ्रमित करती है?
जन्मदिन, समय, कभी कभी असहज कर
देते है जीवन चक्र को तो मन प्रश्न कर उठता है

यह रचना मेरी मानस पुत्री *श्रीमती आभासिंह*
को उसके जन्मदिन 20 अक्टूबर 2012 को
सस्नेह समर्पित



Monday, 1 October 2012

विक्रम वेताल 5


आज
अशांत और उद्विग्न विक्रम ने
वट वृक्ष के डाल पर चला दी तलवार
अचंभित वेताल धड़ाम से भूमिशात
राजन
आपने न्याय किया?

राजन आपको ज्ञात है?
मृत्यु के बाद
चोट का एहसास होता है?
आँखें उठाकर देखो

मुखमुद्रा बदली सी क्यों है?
परिधान और परिवेश भी?
खादी कुर्ता और ये टोपी क्यों?
चेहरे पर कुटिल मुस्कान में ख़ामोशी

उल्टा मैं लटकता हूँ?
और इनके कार्य प्रति पल?
राजन मैं मरकर भी समझता हूँ
और ये अपनी जानें

ये हरसिंगार के फूल
और झिलमिल करती रोशनी
ये तेज, ये प्रदीप्ति
वर्ष में एक बार ही?

हर बरस पोंछ दी जाती हैं मूर्तियां
पुरे बरस धूल ज़मने के लिये?
जन्मदिन पर ही?
धो देते हैं पखेरुओं के बीट
अगले साल तक भूलने के लिए?

राजन
किसने कहा था?
अपमानित करने के लिये
प्रतिमा स्थापित करें?

अकस्मात् शिल्पी के कृति के
होठ हिले और शब्द झरे
एक आग्रह फिर ललकार
अप्रसन्नता से रोष भरे

हाथ नहीं लगाना मुझे
तोड़ने या निर्जन वन में छोड़ने के लिए
अब घिन सी आती है
तुम पर नहीं खुद के कृत्य पर

क्यों नित नये स्वांग रचकर
जन्मदिन मानते हो?
कीर्तन और शांति के गीत गा
छलनी कर, तार-तार कर जाते हो

चलो पकड़ो अपनी राह
या चल पड़ो मेरी राह
साहस जुटाओ
गोली खाओगे?
कठिन हैं राहें?
स्वदेश प्रेम की?

गरीबों की आह?
न फूलों की चाह?
न काँटों की राह?
अकेले-अकेले?

राजन आज तो मौन तोड़ो
मृत शिराओं में खून छोड़ो

आज न सत्य का आग्रह
न गलत पर विस्मय
न वाणी में स्वधर्म
मौन मुस्कराहट धर चौराहे पर

संपूर्णतः मुक्त
ध्यानमग्न, निर्लिप्त, निश्चल
30 जनवरी 1948 से
हे महात्मन
मेरा प्रणाम स्वीकार करें

Thursday, 12 April 2012

बन जाना


नदियां बनीं हैं जैसे, बूंदों को बांध के
तू भी बन जाना, हाथों को थाम के
लम्बा यहां सफर है, रस्ते वीरान से
कांटे भरे डगर हैं, राहें पहचान ले
मिलती चुनौतियां हैं, अपने ही काम से
संघर्ष ही नियति है, इतना तू जान ले
शबनम बनीं हैं जैसे, कोहरे को छान के
तू भी बन जाना, हर सुबह शाम से,

लहरें यहां हैं ऊंची, कश्ती को थाम ले
मंजिल तेरी नियति है, इतना तू ठान ले
चलता ये कारवां है, मंजिल को मान के
सागर सा बन जाना, गिरतों को थाम के
सूरज बना है जैसे, किरणों के नाम से
तू भी बन जाना, कर्मों को बांध के,

मिले हैं जमीं-आसमां, इक दूजे को थाम के,
हम फिर सदा मिलेंगे, पर चेहरे अनजान से,

16/03/1978
छोटी बहन रेखा सिंह को जन्मदिन पर समर्पित
चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 14 February 2012

ऋतु



नन्ही सी गुडि़यों की रानी
आई है परियों की नानी

नित आती रहें चंदा की किरण
बन्नों बन जाना तू चंदन
महके तुमसे गुलशन-गुलशन
खुश्बु से झूमे सारा चमन
लाई सौगातें मनमानी
ऋतिुओं की रानी दिवानी

कुंदन सा चमके तेरा बदन
लोरी गायें ये मस्त पवन
तेरा दामन सजाये ये सावन
ठुमके गाये आंगन-आंगन
ओढ़े तू नई चुनरी धानी
जैसे मौजें ये मस्तानी

मेरे सपनों का तू सिरजन
मेरे आंचल का तू है धन
सुरज से तेरा हो बंधन
राहों में बिखरें रोज सुमन
गंगा की धारा हो जीवन
जगती सा पावन तेरा मन

रमाकांत सिंह 14/04/1978 दंतेवाड़ा
 सौभाग्यकांक्षी ऋतु सूद आत्मजा श्री महेंद्र सूद
के जन्म के 6वें दिन के अवसर पर सस्नेह समर्पित
दंतेवाड़ा जिला बस्तर छत्तीसगढ़