गुरुकुल ५

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Friday, 2 August 2013

समापन?

आत्मदाह / आत्महत्या / पलायन / समापन?


क्या आपने मनुष्य जैसे तुच्छ जीव के अतिरिक्त किसी अन्य जीव को
आत्महत्या करते देखा? या आत्महत्या का प्रयास करते देखा है?

शायद इन निम्न जीवों में सामंजस्य और सहनशीलता का प्रबल भाव होता है

श्रृष्टि का एक मात्र प्राणी और भगवान की उत्तम व अनुपम कृति ही यह दुर्लभ कार्य करते हैं
चलो आत्महत्या करके देखा जाये, मरने के बाद किसी समस्या का समाधान मिल जाये?

बाबूजी की कही एक कहानी आपसे साझा करता हूँ

राजा विक्रमादित्य महारानी मीनाक्षी संग भोजन करते समय अनायास हंस पड़े
मीनाक्षी द्वारा अचानक हंसी कारण कौतुहल बन गया हंसी और वह भी चींटी के जोड़ों पर
राजन मुस्कुराकर टाल गये, तिरिया हठ प्रबल हो उठा, किन्तु विवश हो गये नारी के आंसू से
जिद और प्रेम में जितना भी कम या ज्यादा हो जाये बस कोई मोल और तोल नहीं

राजन को प्राप्त विद्या अनुसार जीवों की भाषा का ज्ञान था किन्तु शर्त अकाट्य
जैसे ही भाषा का रहस्य उजागर होगा, वर का उल्लंघन मृत्यु को टाल नहीं सकता
अनिष्ट निवारण हेतु किसी निर्जन स्थान में ही ज्ञान और मन्त्र को बतलाया जाये
जहाँ जीर्ण शीर्ण कुँए में पीपल का पेड़ उगा हो, और पुराना बरगद के पेड़ में खोह हो

ताकि विद्या को बतलाने के प्रायश्चित स्वरुप आत्मदाह किया जा सके

उज्जैन राज्य के दक्षिण दिशा में तलाश पूरी हुई राजन जैसे ही रहस्य बताने उद्यत हुए
एक बकरी और बकरे का जोड़ा कुँए की ओर निकला, गर्भवती बकरी का मन ललचाया
बकरी ने बकरे से अनुरोध किया, यदि कुँए में उगे कोमल पीपल का पत्ता मिल जाये?
तो पेट का बच्चा और मैं तृप्त हो जायेंगे, कुआं जीर्ण है मृत्यु निश्चित बकरे ने कहा मृदुल

रीता चला गया अनुरोध और समझाईश, जिद बकरी की मर जाओ, किन्तु पत्ते लाओ
बकरे ने अब कड़े ढंग से कहा मुरख मैं मर जाऊंगा, तो क्या हुआ? मैं तो तृप्त हो जाऊँगी
राजन समझ और देख रहे थे, रानी जानवर का मनुहार ताड़ रही थी, जिद प्रबल हो उठा
संयम का बाँध टूटा, बकरे ने निःसंकोच धड़ धड़ कई चोट बकरी के सिर और पेट पर लगाये

बकरे ने कहा मुर्ख बकरी तू मुझे राजा विक्रम जैसा संज्ञा शून्य और विवेकहीन समझती हो
मैं तुम्हारी अंतहीन जिद के लिए अपनी जान दे दूँ,तुम्हे जान देनी है, जाओ तुम स्वतंत्र हो

सामाजिक चेतना, व्यक्तिगत जिम्मेदारी, दायित्वों का निर्वहन, सजगता,सामंजस्य
दया, सेवा, सहिष्णुता, ममता, जीवन्तता, सहयोग, विवशता का सर्वथा अभाव क्यों?



परमपिता की अद्भुत कृति मनुष्य ही है जो अहंकार से परे, ज्ञान, वैभव, विज्ञान का केंद्र?
आत्मदाह / आत्महत्या / पलायन / समापन किसी भी समस्या का न्याय संगत निवारण

जिंदगी जो मेरी है ही नहीं ,अन्यथा करो आत्महत्या। 

और एक बार मरकर पुनः प्राप्त कर देखो ये अनमोल अद्भुत जीवन ?

समर्पित मेरे छोटे भाई दीपक सिंह दीक्षित को 

जिसका जीवन दर्शन और चिंतन प्रेरित करता है। 

चित्र गूगल से साभार
२ जुलाई २०१३ 

Tuesday, 23 July 2013

आत्महत्या भाग २

मैं जीना चाहता हूँ जिंदगी तेरे संग


*****
ज़िन्दगी तुझसे तंग आ गया हूँ?
सोचता हूँ तुझसे होकर पृथक
एक नई पारी को अंजाम दूँ
बंध जाऊं नये बंधन में
जिसे मैं चाहता हूँ अपनी जान से ज्यादा
जो रहेगी बन सहचरी मेरे संग?
ज़िन्दगी के आखरी सांस तलक
तेरी तरह बिन कहे भरेगी माँग मेरी खातिर
या है सिर्फ छलावा है वो
ऐ क्या बोलती तू?

मरुथल की मृगमरीचिका सी कौंधती बिजली बन?

*****
चलते चलते शशि भाई ने कहा
पाजामे की क्रीज और गाड़ी का एवरेज
ज़िन्दगी को सफल बनाता है?
भाई साहब
आप करते रहिये पुत्रेष्टि यज्ञ
डालते रहिये समिधा
और पढ़ते रहिये पहाड़ा
माथे की सलवटे भले ही बदल जाये
नसीब में नहीं लिखा है तो
कुआँ में पानी, और चुनाव में जीत?
और प्रेम?
उम्र भर सांस फुल जाएगी

नाहक परेशां होंगे और संग में पड़ोसी जागेगा ताउम्र?

*****
आज सूरज की किरणों की तरह
केवल तुम्हे महसूस करता हूँ
विक्षुब्ध, बेबस हो बरस चुकी दिन रात
अब बनी रहो धूप छांव सी
आज तेरी फुहार नहीं भिगोती
तन और मन को
चचल हवा के झोके की तरह
छूकर चली जाती है


अंजुरी से फिसलते ज़िन्दगी ने कहा
ये होता है सबके साथ नई कोई बात कहाँ?

मैं जीना चाहता हूँ जिंदगी तेरे संग


क्यूं पूरी जिंदगी गुजर जाती है उहापोह में कसमसाते? 

क्रमशः

समर्पित मेरे छोटे भाई दीपक सिंह दीक्षित को
जिसका जीवन दर्शन और चिंतन प्रेरित करता है।

चित्र गूगल से साभार 

Saturday, 20 July 2013

आत्महत्या भाग 1

लेकिन उनसे कुछ बतियाने मैं वापस लौट पाऊंगा?


*****
गहन चिंतन और विचार के बाद
मैंने सोचा क्यों न आत्महत्या कर लिया जाये
मुक्ति या मोक्ष के लिये
क्या रखा है जीवन में?
क्या मिल जायेगा बड़ा जीवन जीकर?
यदि छोटा भी हो गया
तो बदल क्या जायेगा?
और बिना कुछ कहे
चल भी दिये तो क्या अंतर पड़ जायेगा?
न आगा न पीछा

जीवन को समझने में मैं क्यों बनूँ ऋषि मुनि?

*****
लोग स्वर्ग चले जाते हैं
मरने पर जुट जाते हैं स्वजन
स्वर्गवासी बनाने
ऐसा लोग कहते है
एक बार मैं भी मरना चाहता हूँ
ये देखने का शौक है
कितने लोग जुटेंगे
रोयेगा कौन कौन
और कौन मुस्कुरायेगा मेरे जाने पर

लेकिन उनसे कुछ बतियाने मैं वापस लौट पाऊंगा?

*****
मेरे परम हितैषी ने कहा
आदरणीय
न पढ़ लिखकर आपने अपना
सब कुछ बिगाड़ लिया
और जो लोग जियादा पढ़ लिख भी गये
उन्होंने क्या खम्भा उखाड़ लिया
कल, आज और कल के चक्कर में
ज़िन्दगी भर कुछ कर न सके
सोचते हो इसी चार दिन में
श्रृष्टि को पलट डालोगे

खेल निराला है,  99 के चक्कर से कोई बच पाया?
क्रमशः
20 जुलाई 2013

समर्पित मेरे छोटे भाई दीपक सिंह दीक्षित को
जिसका जीवन दर्शन और चिंतन प्रेरित करता है।