गुरुकुल ५

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Saturday, 22 March 2014

पीथमपुर मेला

पीथमपुर का मेला 
प्रतिवर्ष चैत्र माह कृष्ण पक्ष पञ्चमी { रंग पञ्चमी } को भरता है
आइये मेला का आज आँखों देखा आनंद लें

 तीन सौ पैतीस साल पुराना वट वृक्ष { लोगों के मतानुसार }


 बाबा कलेश्वर नाथ कि सवारी देखने खड़े दर्शनार्थी


 भीड़ को नियंत्रित करती और दिशा निर्देश देती सुरक्षा व्यवस्था में नागरिक और पुलिस


 पीथमपुर का मेला नागा बाबा का धाम बरसों बरस अपनी टोली संग 

 नागा बाबा अपने यात्रा में मुख्य मार्ग में


 नागा बाबा परंपरागत वेश में 


संत भी परंपरागत अस्त्रों संग यात्रा में  


 बाबा कलेश्वर नाथ की सवारी और पुलिस अभिरक्षा संतों और जन कल्याण में


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बाबा कलेश्वर नाथ कि सवारी प्रति वर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष पञ्चमी को निकाली  है 

मेला लगे और मौत का कुआं { मोटर साइकल और कार रेस } न हो मेला लगा कहाँ?


झूला झूले नंदलाला छत्तीसगढ़ के मेले की परम्परा में शामिल 


मेले में रुद्राक्ष बेचने और खरीदने लोग आते हैं रुद्राक्ष अपनी टहनी सहित बिक्री हेतु 


साधु संत भी तकनीक और आधुनिक संचार प्रणाली से अछूते नहीं रह गये 



मुख्य द्वार पर आज भी संत कि सेवा में चिलम भरते लोग गर्व अनुभव करते हैं 


समाज ने जो दिया प्रेम से लिया और किसी ने जो भी माँगा बिन संकोच दिया
शायद यही संत या साधु हों अपनी धुन में मगन मंदिर के मुख्य द्वार पर  



मांदर और मृदंग के आकर के राम कांदा आकर्षण और स्वाद का केंद्र सदा बना रहा
वैष्णव जी, चौहान जी, मामा मदन जी, और शैलेन्द्र बाबू हम भी फोटो ग्राफर के रूप में शामिल 

पार्श्व में कलकल बहती छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी नदी हसदेव  
हसदेव नदी तट पर स्थित हरहर महादेव कलेश्वर नाथ जी का मंदिर
हसदेव नदी का विहंगम दृश्य अपनी अनकही कहानी समेटे सबका सदा इंतज़ार करती 


कलेश्वर नाथ मंदिर का सांध्य कालीन ऊपरी मनोरम दृश्य 


गोधूलि बेला में लौटती सवारी और कन्धा लगाते श्रद्धालु वही जोश वही उमंग

आदरणीय राहुल कुमार सिंह सिंहावलोकन के सर्जक द्वारा मेला के संबंध 
में वृहद लेख ब्लॉग जगत को दिया है मेरा यह अंश मात्र भी उनकी ही देन 

समर्पित बिलासपुर निवासी नेचर सिटी के संरक्षक प्राण चड्ढा भाई जी को 
२१ मार्च २०१४

Saturday, 25 January 2014

तमाचा

जो तुम्हे काँटा बोये उसके लिये तुम फूल बिछा दो?

संत कौन हैं?
राजधर्म क्या है?
प्रजा धर्म का निर्वाह किसका?
धर्म निर्वहन एकांगी किस हद तक न्यायोचित

सब अपनी सीमा पर रहें?
कोई कलेश नहीं न कोई आहत होगा

२६ मार्च २००३ को मेरे पिता तुल्य बुजुर्ग को एक तमाचा जड़ दिया
कोई और नहीं रोज पैर छूनेवाला नाती
अपनी ज़िद मनवाने की खातिर
सागर ने सीमा तोड़ी या कहीं तट बंध को प्रेम संग लापरवाही ने
आहत बरसों की नेह हो गई
ऐसा क्या हो गया एक ही क्षण में झुलस गया सब कुछ

कौन हो गया उच्छश्रृंखल
किसे चढ़ गया मद बिन पिय
एक अनदेखा परिवर्तन घर करने लगा है
उदारता और सहनशीलता संग सहिष्णुता ने भष्मासुर को जन्म दे दिया है

आहत किसने किसे किया
पहल किसने की, दोषी कौन,
आहत यदि अपनी ईहलीला समाप्त कर लेता तो
या ग्लानिवश उसने नाती को गोली मार दी होती तो

साम, दाम,दण्ड और भेद नीति ज़रूरी नहीं क्रमशः आयें

शायद कुछ पलों पहले भी यही हुआ
किसी संत से प्रश्न किया गया
प्रत्युत्तर में एक चांटा जैसा लगा

किसने हमें अधिकार दे दिया अनर्गल प्रश्न करने का

किसी और ने प्रश्न नहीं किया क्या
उन्हें चांटा क्यों नहीं लगा

संत से उलटे सीधे प्रश्न ही क्यों किया जाये
मर्यादा तोड़ें और दोष अन्य पर मढ़ा जाये न्यायसंगत

पत्रकारिता अपनी सीमा के पार जाती
तब ही तो टी वी पत्रकार पहली बार हँसता हुआ दिखा

ये तमाचा एक सीमा को निर्धारित करेगा?
जो तुम्हे काँटा बोये उसके लिये तुम फूल बिछा दो?

26 मार्च 2003
समर्पित नई पीढ़ी को