गुरुकुल ५

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Thursday, 3 January 2013

अनागत / नव वर्ष



पागल मन सोचने लगा
21 वीं सदी में
सूरज पूरब से नहीं
पच्छिम से निकल आवेगा

हवा का रुख बदल जायेगा
नक्षत्र अपना स्थान बदल लेंगे
नभ से बादल दूध बरसायेंगे
पहाड़ी झरनों से झरेंगे मोती

आसमान से बरस पड़ेगा अमृत
किसी ने कहा
अनहोनी कुछ नहीं
जो हुआ
अच्छा हुआ

जीवन वृत्त पर ही
विचरता है जीव
अरे
आज भी डूब गया
सूरज फिर पश्चिम में

पंछी चहक उठे शाखाओं पर
रवि के ताप से
चमक उठे तारे आसमान में
चाँद भी कहाँ निकल धरती से

कुत्ते की पूंछ आज भी
पोंगरी के इंतज़ार में
वही गाँव वही शहर
आदमी उगलता ज़हर

बहती नाली टूटा नहर
औरत और बेटी पर टूटता कहर
न बदला कल
ना ही कल

परछाइयों ने कभी  साथ छोड़ा
कहाँ जला हाथ बरफ से
दिशा भ्रम हो जाये
ऐसी हवा कहाँ चली

न ही बढ़ा दरिया का पानी
सब कुछ रहा यथावत
मदहोशी में कब
झंकृत हो गये तंतु

संग में बैठे ठाले
हम नाहक परेशां होते रहे
ऐसे अनागत के
प्रतीक्षा और स्वागत में

31.12.2000
चित्र गूगल से साभार
25.12 2011 को शून्य कमेन्ट के साथ
प्रकाशित रचना का पुनः प्रकाशन 

21 comments:

  1. बहुत ही गहरा कटाक्ष... और एक दिन के जश्न में आकंठ डूब जाने वाले मदमत्त जनसमुदाय को एक सीख.. बहुत अच्छे!!

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  2. बहुत सही ..बहुत सटीक रचना..

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  3. औरत और बेटी पर टूटता कहर
    न बदला कल
    ना ही कल

    सच है ....

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  4. दुनिया हमसे नहीं , हमसे दुनिया है ...

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  5. मानो तो नव वर्ष -- न मानो तो एक और दिन !
    उम्दा रचना।
    .

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  6. ''सबको मुबारक नया साल'' कहने का बहाना तो मिला ही.

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  7. हम नाहक परेशां होते रहे
    ऐसे अनागत के
    प्रतीक्षा और स्वागत में,,,,निराले अंदाज में गहरा कटाक्ष,,,,

    recent post: किस्मत हिन्दुस्तान की,

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  8. सूरज पूरब से निकलता है तो ऐसे हालात हैं...काश कभी पश्चिम से निकले और दुनिया बदल जाए !
    कुछ नयी सोच लिए कविता .

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  9. बेहतरीन...............
    कुछ बदलता नहीं.....भरम है कि टूटता नहीं...

    सादर
    अनु

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  10. संग में बैठे ठाले
    हम नाहक परेशां होते रहे
    ऐसे अनागत के
    प्रतीक्षा और स्वागत में
    ....स्तिथियाँ नहीं बदलती ...क्योंकि मनोवृत्तियां नहीं बदलतीं ....बहुत सुन्दर और सटीक !

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  11. बहुत सुन्दर संवेदनशील रचना ...

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  12. वाह क्या बात है
    सार्थक सन्देश देती रचना

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  13. बाहर सब कुछ वैसा ही रहता है..बदलना है तो भीतर को..सुंदर प्रस्तुति !

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  14. सार्थकता लिये सशक्‍त लेखन ...

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  15. मानो तो हर पल नया है ..

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  16. उम्मीदे जब जितनी ज्यादा होती है उनके पूरा ना होने से कष्ट भी उतना ही ज्यादा होता है. इसलिए खुद पर भरोसा ही सबसे अच्छा है.

    सुंदर कविता मन को छू जाती है.

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  17. सुन्दर भाव. इस बदलाव की तारीख आने में ताखीर न जाने कब तक...

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  18. बदलाव सतत होते हुवे भी नहीं बदलता ... ओर तारीखें बदलने से तो कभी नहीं ...

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  19. सच ही तो है... हर दिन की तरह एक और दिन, जो कहलाता है नये वर्ष का पहला दिन... नया दिन...~शायद कर जाए कुछ नया, छेड़ जाए कुछ नयी लहरें... जो कर दें जागृत इंसानियत को इंसानों के अंदर...
    ~सादर!!!

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  20. आपकी किस रचना को कम कहूँ ........... शिराएँ रक्त संचार से तन जाती हैं

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