गुरुकुल ५

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Tuesday, 25 March 2014

गुरुकुल ५

THE TREE NEVER STOPPED GIVING

पू मा शा पाटियापाली
विकास खण्ड करतला, कोरबा, छत्तीसगढ़  
                

विद्यालय के मुख्य मार्ग और द्वार पर स्वागत करता आम का वृक्ष

जीर्ण शीर्ण ग्राम पंचायत भवन जिसे तोड़कर नया स्कुल भवन बनाने की मसक्कत जारी
 है जन सहयोग से यहाँ इसी गर्मी की  छुट्टी में निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा

विद्यालय के निंजी सड़क पर दोनों ओर रोपित नीम और अशोक के पौधे अतिथियों
का स्वागत करते साथ ही खुले वातावरण में बच्चों के मध्यान्ह भोजन का बैठका

नीम का पेड़ जिसकी छाया में बैठकर चाय कि चुस्की ली जाती है और कभी कभार
भजिया, पकौड़े, पोहा, सेवई का आनंद ले लेते हैं कुक होते हैं बुधराम यादव जी { भृत्य }

हर आदमी सोचता है वह महान है किन्तु उसे श्रेष्ठ बनाते हैं उसकी परिधि के लोग 
इसी तरह इन पौधों को पानी सींचा बच्चों ने रक्षा की गांव वालों ने और बाड़ को बाँधा 
बच्चों संग मिलकर बुधराम यादव जी में भर दोपहरी तपती धूप में, तब ये बच पाये 
मुझे सदा गर्व रहा अपने बच्चों के मेहनत पर विद्यालय को अनुशासित उन्होंने बनाया
स्वच्छता का पाठ हमने उनसे पढ़ा और पोथी के लेखक हम बना दिये गये, लो बोलो जी

विद्यालय मार्ग पर रोपे गये २० नीम के पौधे बच पाये ०७ पौधे, पर्याप्त है गांव के लोगों के
मुखारी के लिये, संतोष है चलो कुछ तो हुआ लोग कुछ बरस यादों को चबायेंगे तो सही

पार्श्व में दिखता बंज़र जमीन इसका ही हिस्सा है स्कुल भवन का सड़क और मैदान
बच्चों के मेहनत और लगन ने ही इसे आज इतना हरा भरा बना दिया कि बस

ये अशोक का पेड़ आज २० फीट से ज्यादा ऊँचा है इसे भी अन्य ४२ पौधों की भांति एक ही रात में 
काट दिया गया था किन्तु जे. एस.कँवर जी ने मिट्टी की पुट्टी बांधकर इसे नया जीवन दिया

एक इमारती पेड़ कसही बरपाली रेल्वे स्टेशन के समीप से लाकर रोपित किया गया
नीम की तरह गर्मी माह में बहुत घनी छाया देता है और संयुक्त पत्तियां पायी जाती हैं

सबसे ज्यादा दातुन की त्रास सहने वाला नीम का पेड़ कई बार मुख्य डाल टूटने के बाद भी
अपनी अस्मिता को बचाये लोगों को प्रेम बांटता बिना किसी प्रतिरोध हँसता रोज 

१९९८  में मेरी पदस्थापना की गई उच्च वर्ग शिक्षक किन्तु २००० में पू मा शा पाटियापाली  

तब शाला में लड़कियों के लिये बाथरूम नहीं था गांडापाली के सरपंच अमर सिंह से ४ बोरी
सीमेंट अनुदान में प्राप्त कर अपने हाथों से बनाया बाथरूम, आज भले ही जीर्ण शीर्ण, भग्न


जीर्ण शीर्ण और भग्न बाथरूम { मेरे द्वारा निर्मित }
विद्यालय भवन के पीछे लगाया नीम का पेड़ आज बिजली लगी पिछले साल तक
बिजली नहीं थी तब इन्हीं पेड़ों ने ठण्डा रखा भवन को और बच्चों का अध्ययन और
हमारा अध्यापन भी अवरुद्ध नहीं हुआ ग्राम्य जीवन और विद्यालयों की यही शान

शाला भवन के सामने लगा बेल का पेड़ मेरे कमरे को ठण्डक और सुकून देता है
सावन के महीने में लोगों को पूजा के विल्व पत्र देता, ख़ुशी होती है महिलाओं को

अशोक के पौधे के साथ स्कुल की शोभा बढ़ाते बाड़ में लगे पौधे जहां मैं अक्सर खड़ा
अपने भाग्य को सराहता अपने विगत चौदह बरस की यादों में खो जाता हूँ

स्वागत में शाला के प्रवेश द्वार पर अशोक का वृक्ष शालीनता से खड़ा विगत कई बरसों से

विद्यालय के पीछे लगाया गया गुलमोहर पतझड़ कि मार सहकर किन्तु रुकिए
फूल लगेगे और लाल कर देगा शाला की छत को आसमान से लगकर झरने जमीं पर

बांस की बाड़ हर तीसरे दिन बांधते हैं और बच्चे शाम को क्रिकेट खेलते रोज बैठकर 
उस पर झूलकर नीचे कर जाते है वो अपनी ज़िद पर अड़े हम भी अपनी ज़िद पर 

चमकती पत्तियाँ प्रेम का सन्देश देती तुम मेरी सेवा करना मैं तुम्हे घनी छांव दूंगा 


खम्हार का इमारती पेड़ पतझड़ कि कहानी बयां करता मेरी तरह अकेलेपन की 
४२ पेड़ एक ही रात काट दिये गये थे  जिनकी कहानी उनके ठूंठ ही की जबानी 


किसी की  नज़र लगी मुझे काट दिया गया 

मेरा क्या कुसुर मैं तो छाँव देता हूँ  

एक वृक्ष सौ पुत्रो के समान है?

और करे अपराध और पाये फल भोग 

जल ही जीवन है तो वनस्पति?

जंगल नहीं होता तो जंगल नहीं कटता 

इक्कीसवी सदी में भी लोग नासमझ हैं ?

बेक़सूर था मैं फिर क्यूँ मुझे सजा मिली ?

*हमारी  उम्र बीत गई आशियाँ बसाने में
इन्हे समय नहीं लगा आशियाँ जलाने में 

*आज भी मेरे लहू का रंग हरा हो जाता है
और कोपलें बयां करती हैं धुप की कहानी 


कल तक जो जमीं बंज़र थी आज बच्चों ने अपने श्रमकणों से सींचकर हरा कर दिया 

वो आम का पेड़ जिसकी छाया में हम विगत  १४ बरसों से प्रार्थना करते आ रहे हैं यही नहीं 
प्रति वर्ष इसी वृक्ष की  छाया में गणतंत्र दिवस को सोल्लास सांस्कृतिक कार्यक्रम के रंग में डूबे  
 पुरे गांववासी एक छत के तले बिन भेद भाव सहज भाव से भूल जाते है दीन दुनिया 


२६ जनवरी २०१४ को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम को अपनी छाँव देता आम का पेड़ 
ईश्वर उस महान व्यक्ति को स्वर्ग में उच्च पद प्रदान करें जिसकी प्रेरणा से पेड़ लगे 
स्वर्ग से भी ज्यादा संसार की सबसे खूबसूरत जगह
मेरे विद्यालय का आँगन
२५ मार्च २०१४ 

Monday, 25 June 2012

पर्यावरण



पर्यावरण और शिक्षा विद्यालय में
1 तारे, बादल, नक्षत्र मंडल, मौसम,
2 नदी, नाला, पहाड़, खड्ड-खार्इ,
3 मैदान, मिट्टी, खनिज,
4 वनस्पति, फल, फूल,
5 कीट-पतंगे,
6 पशु, पक्षी,
विदयालय में उपरोक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखकर अध्ययन-अध्यापन शुरू करें।

गांवों में वैज्ञानिकता का ज्ञान प्रारंभिक स्तर से ही मिल जाता है, नित्य कर्म को जाते वक्त वनस्पति, जीव, जन्तु, मिटटी-पत्थर, मौसम, पानी का स्रोत, औषधीय वनस्पति का ज्ञान, इसी प्रकार तैरने में सभी अंगों की देखभाल, स्वयं से स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, दातुन तोड़ते वक्त पर्यावरण के प्रति प्रेम, सजगता, उन्मुखता, चेतनता, क्रिया-प्रतिक्रिया, विस्तार का ज्ञान, क्रमिक स्तर पर शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक ज्ञान की उपलब्धि प्राप्त हो जाती है। सजीव-निर्जीव, सब्जी, फल, फूल, पक्षी, जानवर, पशु, कीट-पतंगों का जीवन चक्र, मौसम का व्यवहार, मिट्टी-पत्थर, बादल का महत्व, उपयोगिता, तथा इनकी अन्योन्याश्रितता का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

प्रकृति का मूल, जड़- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर, का वृहद और व्यावहारिक ज्ञान और अध्ययन एवं प्राकृतिक उपादानों का दोहन, स्रोत, महत्व, उपयोगिता, अन्योन्याश्रितता का सूक्ष्म विवेचन और अध्ययन भी आवश्यक है। प्रकृति का दूसरा भाग चेतन- वनस्पति, निम्नवर्गीय जीव एवं उच्चवर्गीय जीवों में प्राणी, सरीसृप, मछली, उभयचर, स्तनधारियों का व्यापक अध्ययन करें।

नक्षत्र विज्ञान का अलौकिक ज्ञान, सूर्य, चंद्र, पृथ्वी तथा भूगर्भ विज्ञान के साथ अन्य आकाशीय पिण्डों, ग्रहों का अनंत तक विस्तृत ज्ञान तथा संभावनाएं शामिल हैं। वर्ष, महीना, दिन, सुबह, शाम, दोपहर, रात, ब्रह्म मुहुर्त, गोधूलि बेला, आधी रात, अलसुबह, सूर्योदय, सूर्यास्त, पल, क्षण, पहर, ऋतु, उपऋतु, संवत, विक्रम संवत, शक संवत, हिन्दी के महीने, अंग्रेजी महीने, पखवाड़ा, कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष, तिथियां, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, राशियां, चद्रमंडल, सूर्यमंडल का सहज और सरल अनिवार्य परिवेशगत ज्ञान समाहित हो।

भाषा विज्ञान, ध्वनि विज्ञान, लिपि की दृष्टि से व्यक्तिगत एवं राष्‍ट्रीय हित में पूरक एवं संपूरक विकास की स्थिति में स्वरूप सदैव तदर्थ परिस्थिति परिवेशजन्य ज्ञान अनिवार्य है। वास्तव में इसके आगे भी बहुत कुछ है, और पीछे भी सब कुछ अनंत तक विस्तृत है और इन सबके उपर प्रत्येक जाति, धर्म, समुदाय, वर्ग द्वारा प्रचलित उनकी गणना व अवधारणा को ध्यान में रखकर ज्ञान का स्वरूप निर्धारित करें ताकि पर्यावरण का ज्ञान लोक हित में जाति, धर्म, लिंग, समुदाय, रंग, वर्ग के भेद से परे ज्ञान हो क्योंकि औपचारिक, नियमित, व्यवस्थित, स्थिर, एवं वैज्ञानिक पाठयक्रम के साथ ही हम शिक्षा के मूल उद्देश्य की पूर्ति कर पायेंगे।


बालकों के सर्वागींण विकास के लिये उसके शारीरिक, चारित्रिक, आध्यात्मिक, नैतिक, विकास के साथ उसके सांस्कृतिक व मानसिक विकास के पटों को भी खोलना पड़ेगा, जहां उसे अपने मूल्य, आदर्श, नीति, जीवन शैली की स्पष्ट झलक दिखलार्इ पड़े। माता-पिता, अभिभावक के साथ-साथ राष्ट्र भी उस पर गर्व कर सके और उसे स्‍वयं अपने भारतीय होने पर गर्व हो।


06.04.2003
चित्र गूगल से साभार